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बूँद जो थी अब नदी हो गयी

२१२२   २१२२   १२

बूँद जो थी अब नदी हो गयी

दिल्लगी दिल की लगी हो गयी

 

जिंदगी का अर्थ बस दर्द था

तुम मिले आसूदगी हो गयी

 

आ गया जो मौसमे गुल इधर

शाख सूखी थी हरी हो गयी

 

बिन तुम्हारे एक पल यूँ लगा

जैसे पूरी इक सदी हो गयी

 

जिंदगी गुलपैरहन सी हुई 

आप से जो दोस्ती हो गयी 

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 3, 2018 at 9:08pm

आ.भाई नीरज जी, सुंदर गजल हुयी है । हार्दिक बधाई ।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on July 3, 2018 at 12:41pm
बहुत सुंदर गजल, बहुत बहुत बधाई आपको
Comment by Neeraj Neer on July 3, 2018 at 7:08am
आप सभी महानुभावों का आभार। जनाब समर साहब के बताये अनुसार मैं कोशिश करता हूँ।
Comment by Neelam Upadhyaya on July 2, 2018 at 3:45pm

आदरणीय नीरज जी, बढ़िया गजल की पेशक़श के लिए मुबारकबाद ।

Comment by Mohammed Arif on July 2, 2018 at 1:58pm

आदरणीय नीरज जी आदाब,

                       बहुत अच्छी ग़ज़ल । शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद । आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब 

 की इस्लाह का संज्ञान लें ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on July 2, 2018 at 12:52pm

वाह वाह बहुत ही खूब ग़ज़ल कही है आदरणीय...

Comment by Samar kabeer on July 2, 2018 at 12:34pm

जनाब नीरज जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है, दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

आख़री शैर में तक़ाबुल-ए-रदीफ़ देखें ।

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