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सारी उम्र खटे - एक नवगीत

अंतर्मन में जाने कितने,

ज्वालामुखी फटे.

दूरी रही सुखों से अपनी,

दुख ही रहे सटे.

 

झोंपड़ियों में बुलडोजर के,

जब-तब घाव सहे.

अरमानों की जली चिताएँ,

सारे स्वप्न दहे.

 

गम की आँधी तूफानों के,

सम्मुख रहे डटे.

 

धागे बाँध प्रेम के हमने,

रिश्तों को जोड़ा.

कभी किसी विपदा में जिनका,

हाथ नहीं छोड़ा.

 

सूख गया जब खेत हमारा,

रहते कटे-कटे.

 

बहा पसीना सींची हमने,

आँगन की बगिया.

मौसम रोज बदलता करवट,

उड़ा रहा निंदिया.

 

समझ न पाये मिला हमें क्या,

सारी उम्र खटे.

"मौलिक एवं अप्रकाशित"

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 11, 2018 at 3:22pm

आदरणीय vijay nikore  जी आपका हृदय से आभार 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 11, 2018 at 3:21pm

आदरणीय बृजेश कुमार 'ब्रज' जी आपका हृदय से आभार 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 11, 2018 at 3:21pm

आदरणीया babitagupta जी, आपको रचना पसंद आई, आपका दिल से शुक्रिया 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 11, 2018 at 3:20pm

आदरणीय Mohammed Arif  जी आपकी मनभावन प्रतिक्रिया को सादर नमन, यूँ ही स्नेह बनाये रखें .

Comment by vijay nikore on June 10, 2018 at 1:16am

बहुत सुन्दर ! बधाई।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 9, 2018 at 2:35pm

आदरणीय शर्मा जी अच्छी रचना के लिए बधाई स्वीकारें..

Comment by pratibha pande on June 8, 2018 at 10:26am

मुग्ध कर दिया आपके इस नवगीत / गीत ने , हार्दिक बधाई आदरणीय

Comment by babitagupta on June 7, 2018 at 3:27pm

जीवन संघर्ष को दर्शाती कविता बहुत ही सुंदर .बहुत बहुत बधाई आदरणीय सर जी.

Comment by Mohammed Arif on June 7, 2018 at 2:08pm

आदरणीय बसंंत कुमार जी आदाब,

                             बहुत ही प्यारा नवगीत । वाकई दिल से लिखा गया गीत । आपसे आगामी भी ऐसे ही गीतों की अपेक्षा है । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

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