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हमे साँचे में ढाला जा रहा है

1222 1222 122
बड़ी  मुद्दत   से  टाला  जा  रहा  है ।
किसी  का  जुल्म  पाला  जा  रहा है ।। 1

मुझे   मालूम  है  वह   बेख़ता   थी ।
किया बेशक  हलाला  जा  रहा  है ।।2

लगीं हैं बोलियां फिर जिस्म पर क्यूँ ।
यहाँ  सिक्का उछाला  जा  रहा  है ।।3

कहीं  मैं   खो  न  जाऊं  तीरगी  में ।
मेरे  घर   से  उजाला  जा  रहा  है ।।4

उसे   महबूब  की आहट मिली क्या  ।
चमन  को  फिर खंगाला जा  रहा है ।।5

नशे में है कहाँ वह रिन्द अब तक ।
कदम उससे  संभाला  जा  रहा है ।।6

तुम्हारे  इश्क   में   लुटता  रहा   मैं ।
दिवाला  फिर निकाला जा  रहा  है ।।7

करेगा काम क्यों वह  नौजवां  अब ।
उदर तक तो निवाला  जा  रहा है ।।8

उसे  इज्जत  मिलेगी   कौन  जाने ।
मेरा   लेकर  हवाला  जा  रहा   है ।।9

रहूँ  खामोश  अक्सर  दर्द  सहकर ।
मुझे  सांचे  में  ढाला  जा  रहा  है ।।10

बला  का  खूब  सूरत  चाँद  होगा ।।
जिसे   लेने   रिसाला   जा   रहा   है ।।11

          -- नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित

 

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 3, 2018 at 9:01am

आ. भाई नवीन जी, सुंदर गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on May 1, 2018 at 12:29pm

आ0 श्याम नारायण वर्मा जी सादर आभार ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on May 1, 2018 at 12:28pm

आ0 तेजवीर सिंह साहब सादर आभार 

Comment by Naveen Mani Tripathi on May 1, 2018 at 12:27pm

आ0 कबीर सर सादर आभार । हलाला वाले शेर को हटा दूंगा सर । 

Comment by TEJ VEER SINGH on May 1, 2018 at 9:30am

हार्दिक बधाई आदरणीय नवीन मणि जी। बेहतरीन गज़ल।

रहूँ  खामोश  अक्सर  दर्द  सहकर ।
मुझे  सांचे  में  ढाला  जा  रहा  है ।।10

Comment by Samar kabeer on April 30, 2018 at 6:13pm

जनाब नवीन जी आदाब, अच्छी ग़ज़ल है, बधाई स्वीकार करें ।

दूसरा शैर स्पष्ट नहीं,'हलाला' के बारे में जानकारी हासिल करें,फिर लिखें ।

Comment by Shyam Narain Verma on April 30, 2018 at 1:28pm
बहुत खूबसूरत ग़ज़ल! आपको बहुत-बहुत बधाई!

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