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चाँद बन जाऊंगी ..

चाँद बन जाऊंगी ..

कितनी नादान हूँ मैं
निश्चिंत हो गई
अपनी सारी
तरल व्यथा
झील में तैरते
चाँद को सौंपकर

हर लम्हा जो
एक शिला लेख सा
मेरे अवचेतन में
अंगार सा जीवित था
निश्चिंत हो गई
उसे
झील में तैरते

चाँद को सौंपकर

उम्र कैसे फिसल गई
अपने तकिये पर
तुम्हारी गंध को
सहेजते -सहेजते
कुछ पता न चला
निश्चिंत हो गई
अपनी चेतना के जंगल में व्याप्त
श्वासों में जीवित
श्वासों की गंध को
झील में तैरते

चाँद को सौंपकर

मिलूंगी
मैं
मेरे बाद भी
यहीं
तुम्हें ढूंढते हुए
मिलोगे तुम भी
मुझे
यहीं
इसी झील पर तैरती
मेरी कल्पनाओं की छवि को
साकार करते हुए


उस दिन
हाँ, उस दिन

मैं
पूर्णतः और अपूर्णतः के
मध्य की महीन दूरी को मिटा
निश्चिंत हो जाऊंगी
तुम्हारी अदृश्यता में
स्वयं के शेष को

समाहित कर
चाँद बन जाऊंगी
स्वयं को
झील में तैरते

चाँद को सौंपकर

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Sushil Sarna on May 1, 2018 at 12:48pm

आदरणीय बृजेश कुमार ब्रज जी प्रस्तुति को अपना स्नेह देने का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on May 1, 2018 at 12:47pm

आदरणीय विजय निकोर जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on May 1, 2018 at 12:46pm

आदरणीय समर कबीर साहिब, आदाब ... प्रस्तुति आपकी मधुर प्रशंसा की आभारी है।

Comment by Sushil Sarna on May 1, 2018 at 12:46pm

आदरणीय हर्ष महाजन जी सृजन को मान देने का दिल से आभार।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 27, 2018 at 4:25pm

वाह आदरणीय कितने सुन्दर भावों की उतनी ही खूबसूरती से समेटा है..

Comment by Neelam Upadhyaya on April 25, 2018 at 11:08am

 आदरणीय सुशील सरना जी, बहुत सुंदर कविता । बधाई ।

Comment by Samar kabeer on April 24, 2018 at 6:01pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब,बहुत उम्दा कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Harash Mahajan on April 24, 2018 at 5:51pm

बहुत ही सुंदर आदरणीय सुशील जी ।

Comment by Sushil Sarna on April 24, 2018 at 4:01pm

आदरणीय श्याम नारायण जी सृजन को मान देने का दिल से आभार।

Comment by Shyam Narain Verma on April 23, 2018 at 12:31pm
सुंदर भाव से संजोयी रचना पर बधाई स्वीकारें आदरणीय, सादर

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