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ग़ज़ल- मेरा घर भी कितना हवादार है।

बह्र - फऊलुन फऊलुन फऊलुन फउल

न छत है न कोई भी दीवार है।
मेरा घर भी कितना हवादार है।

हुनरमन्द होकर भी बेकार है।
अजीबोगरीब उसका किरदार है।

जिसे दूर तक सूझता ही नहीं,
वही इस कबीले का सरदार है।

भले ही जुदा धड़ से सर होगया,
अभी भी मेरे सर पे दश्तार है।

वो शेखी पे शेखी बघारे तो क्या,
सभी जानते हैं वो मुरदार है।

दवा का असर कोई होगा नहीं,
वो तन से नहीं मन से बीमार है।

अदालत से बेशक बरी हो गया,
मग़र आदमी वो गुनहगार है।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 2, 2018 at 8:33pm

बहुत ही शानदार ग़ज़ल कही आदरणीय..सादर

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 2, 2018 at 3:49pm

बहुत खूब...

Comment by vijay nikore on February 2, 2018 at 1:14pm

अच्छी गज़ल के लिए दिल से बधाई, आदरणीय राम अवध जी

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on February 1, 2018 at 5:59pm

आदर्णीय सुरेन्द्र नाथ सिंह जी ग़ज़ल सराहना के लिये सादर आभार।

Comment by नाथ सोनांचली on February 1, 2018 at 3:57am

आद0 राम अवध विश्वकर्मा जीसादर अभिवादन। बढिया ग़ज़ल कही आपने। शैर दर शैर मुबारक पेश करता हूँ।

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on January 31, 2018 at 9:40pm

आदर्णीय तस्दीक़ अहमद साहब आपके द्वारा की गई सारगर्भित टिप्पणी के लिये बहुत बहुत शुक्रिया। दशतार  की जगह दस्तार कर लूँँगा।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on January 31, 2018 at 9:21pm

जनाब राम अवध साहिब , उम्दा ग़ज़ल हुई है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमायें।

शेर4 में  सानी मिसरे में मेरे की जगह मगर  करने से और अच्छा हो सकता है  , सही शब्द  दस्तार  है   दशतार  नहीं  , देखियेगा ।

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on January 30, 2018 at 8:46pm

ग़ज़ल सराहना के लिये आदर्णीय तेज वीर सिंह जी सादर धन्यवाद

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on January 30, 2018 at 8:42pm

सादर आभार आदर्णीय उसमानी साहब हौसलाअफजाई के लिये

Comment by TEJ VEER SINGH on January 30, 2018 at 8:38pm

हार्दिक बधाई आदरणीय राम अवध विश्वकर्मा जी।बेहतरीन गज़ल।

जिसे दूर तक सूझता ही नहीं,
वही इस कबीले का सरदार है।

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