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नंगे सच का द्वंद

नंगे सच का द्वंद

मुझे सड़क पार करने की जल्दी थी और मैं डीवाईडर पर खड़ा था |मेरी दृष्टी उसकी पीठ पर पड़ी और मैं कुछ देर तक चोरों की भांति उसे देखता रहा |क्षत-विक्षत शाल से ढकी और पटरी की दो समांतर ग्रील से कटती उसकी पीठ  रामलीला का टूटा शिव-धनुष प्रतीत हो रही थी |

एक दिन पहले ही आई बरसात से मुख्य मार्ग की किनारियाँ कीचड़ से पटी पड़ी थी और सभ्य और जागरूक समाज द्वारा यहाँ-वहाँ फैलाया गया कचरा ऐसे लग रहा था मानों किसी प्लेन काली साड़ी के स्लेटी बार्डर पर जगह-जगह लगे दाग |

वो जहाँ बैठी थी उससे 10 फीट की दूरी पर कचरे का छोटा टीला था |लोग उसके दाएं-बाएँ से गुजर रहे थे |कुछ रुक कर उसे एक दृष्टी  देखते और कुछ अपनी हडबडी में अनदेखा कर आगे बढ़ जाते |कुछ नाक पर हाथ रख तो कुछ बेपरवाही से अपनी दौड़ में व्यस्त पर रुकने का साहस किसी में ना था |

विचारों की तंद्रा टूटी तो मैंने सड़क पार की और उस तरफ से निकलने लगा जिधर वो घुटने में सिर दबाए बैठी थी |

वो बैठी-बैठी कुछ बड़बड़ा रही थी |अचानक से उसने मेरी तरफ देखा और उसकी लाल-लाल आँखे मेरी आँखों से टकरा गईं |मैंने झटपट अपनी नजर घुमाई और आसमान की तरफ देखा काले-सफ़ेद मेघ-मंडलों में से कहीं-कहीं से लाल रोशनी फूट रही थी |

उस एक दृष्टी में मैंने उसके लंबे,स्लेटी और लू लगी कोपड़ की तरह हो चुके चहरे को भी देख लिया |मैंने फिर उसकी तरफ देखा वो घुटने में खुद को दबाए ठंड से बचने का संघर्ष कर रही थी |सड़क की ग्रील और बांस पर टिकी,गीले टाट-चिथड़ों से ढकी उसकी छत उसी की तरह घुटनों में सिर दबाए हुई थी |उसके पास रखी गठरी,कंबल सब गीले थे |एक दिन पहले ही सरदी की पहली बारिश हुई  थी |

व्यक्तिवादी ने खुश होकर कहा-तो आज से लिखना शुरु

अंतरात्मा ने धिक्कारा-रे पामर,लोभी !

मानवतावाद जागा -क्या इसे प्लास्टिक की शीट लाकर दे दूँ या रैन-बसेरे में भेजने का यत्न करूं !

“प्रकृतिवादी यथार्थवादी एक साथ बोले-“डोन्ट डिस्टर्ब ,लेट्स दी शो गो इट्स वे |”

 निराला ने धीरे से कानों में कहा-“वियोगी होगा पहला कवि,आह से उपजा होगा गान |”

तभी मार्क्सवाद ने चिल्ला के कहा-“क्रांति,लाल झंडा,आम-आदमी |”

तभी तिपहियां पर भागते हुए स्पीकर आया -“हमारी योजनाएँ हाशिए पर पड़े हर उस इंसान के लिए है जिसे शोषणकारी प्रवृत्ति ने निचोड़ लिया है | उसमें बैठे आदमी ने मुझे एक पर्चा थमाया और तिपहिया आगे निकल गया |

सोमेश कुमार (मौलिक एवं अप्रकाशित )

 

 

 

 

 

 

 

 

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on December 16, 2017 at 8:46pm

सच का यथार्थ चित्रण..खूब किया..

Comment by Samar kabeer on December 14, 2017 at 5:20pm

जनाब सोमेश जी आदाब,सुंदर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Neelam Upadhyaya on December 13, 2017 at 11:53am

अदरणीय सोमेश जी, अच्छी प्रस्तुति के लिए बधाई ।

Comment by TEJ VEER SINGH on December 13, 2017 at 10:02am

हार्दिक बधाई आदरणीय सोमेश कुमार जी।बेहतरीन प्रस्तुति।

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