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बशीर बद्र साहब की जमीन पर एक तरही ग़ज़ल

अरकान-: मफ़ाइलुन फ़्इलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन/फ़इलुन

नया ज़माना नया आफ़ताब दे जाओ
मिटा दे जुर्म जो वो इन्क़िलाब दे जाओ

हज़ार बार कहा है जवाब दे जाओ,
मैं कितनी बार लुटा हूँ हिसाब दे जाओ||

मुझे पसंद नही मरना इश्क़ में यारो,
मुझे है शौक़ नशे का शराब दे जाओ||

वो कह रहे हैं खड़े होके बाम पर मुझ से,
तमाशबीन बहुत हैं नक़ाब दे जाओ ||

करम करो ये मेरे हाल पर चले जाना
*उदास रात है कोई तो ख़्वाब दे जाओ*||

अगर जगाना है सोए हुओं को ऐ यारो,
तुम इनको इल्म की कोई किताब दे जाओ||

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Samar kabeer on October 26, 2017 at 4:25pm
पहले आप मौलिकता का अर्थ समझाएं,और ये बताएं कि तरही ग़ज़ल मौलिक क्यों नहीं होती ?
Comment by Mohammed Arif on October 26, 2017 at 3:45pm

आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब आदाब, मैंने अपनी टिप्पणी से किसी को भी आहत नहीं किया है और न वैसी मेरी प्रवृत्ति रही है । मैंने तो सिर्फ और सिर्फ मौलिकता की हिमायत की है । सादर ।

Comment by Samar kabeer on October 26, 2017 at 3:16pm

जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहिब आदाब,आपकी टिप्पणी और उस पर आपके ग़लत तर्क पढ़कर इंतिहाई तकलीफ़ हुई,मैं ये समझने से क़ासिर हूँ कि अचानक आपको क्या हो गया है जो आपने इस तरह की टिप्पणी दी,आपकी टिप्पणी का शिकार में भी हुआ,कि अभी मेरी ग़ज़ल 'ग़ालिब की ज़मीन में'ताज़ा ही है, आपने मेरी ग़ज़ल पर ये टिप्पणी दी होती तो मुझे इतना दुख नहीं होता,आप तो सदियों पुरानी तहज़ीब के भी ख़िलाफ़ हो गए,ये अच्छा संकेत नहीं है,मेरा आपको मश्विरा है कि आपको इसके लिए ग़ज़ल कार से और मंच से मुआफ़ी मांगना चाहिए,क्योंकि आपकी बात हर लिहाज़ से ग़लत और बे बुनियाद है ।

Comment by Mohammed Arif on October 26, 2017 at 2:55pm
आदरणीय सौरभ पांडे जी आदाब, मैंने आदरणीय नीलेश जी पहले ही पढ़ लिया है । सादर ।
Comment by SALIM RAZA REWA on October 26, 2017 at 2:55pm
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' जी,
ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए मुबारक़बाद.

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 26, 2017 at 1:27pm

आदरणीय आरिफ़ साहब, आपके कहे पर आदरणीय नीलेश नूर जी ने पूरी व्याख्यात्मक टिप्पणी की है. आपको समझने में सहूलियत होगी.

जिस शेर में ग़िरह लगायी जाती है, उस शेर को हटा भी दिया जाय तो पूरी ग़ज़ल तो शायर की हुई न ?

इसी विन्दु पर आपसे एक और बात साझा करता चलूँ.  ओबीओ के तरही मुशायरे में तरही मिसरे का मतले में प्रयोग करने की मनाही है. आपने सोचा है कि ऐसा क्यों है ?

वस्तुतः, मतला किसी ग़ज़ल का अभिन्न हिस्सा हुआ करता है. अगर किसी सदस्य ने अपनी ग़ज़ल के मतले में ग़िरह लगा दी तो चाह कर भी उसे हटा नहीं सकता. जबकि ग़िरह वाले शेर को वो आसानी से हटा कर पूरी ग़ज़ल को अपनी ग़ज़ल कहता हुआ कायदे से कहीं भी पढ़ सकता है.  ओबीओ के पटल पर तरही मुशायरा की जब शुरुआत हो रही थी तो यह बात संचालक महोदय, प्रधान सम्पादक महोदय आदि को अच्छी तरह से मालूम थी. इसी कारण, सदस्यों के लिए ही यह नियम बनाया गया कि तरह मिसरे का प्रयोग मतले में न किया जाय. 

  

Comment by Mohammed Arif on October 26, 2017 at 1:02pm
आदरणीय सौरभ पांडे जी आदाब,
"मैं ग़ज़ल में पूर्ण मौलिकता का पक्षधर हूँ" से आशय बिना किसी शायर के मिसरे का इस्तेमाल करते हुए ग़ज़ल कहने से है ।सादर ।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 26, 2017 at 12:54pm

// मैं ग़ज़ल में पूर्ण मौलिकता का पक्षधर हूँ //

इस कहे का क्या मतलब हुआ, भाई ? 

एक बात और, बशीर बद्र का ही सबसे मशहूर शेर है --

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो

न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए.. .........

बताते हैं कि ये निहायत ख़ूबसूरत शेर एक तरही मुशायरे की ग़ज़ल से ही है. और इसी शेर पर ग़िरह लगायी गयी है. यह सूचना चाहे सही हो या न हो, लेकिन ये रोचक तथ्य किस बात की ओर इशारा करता है ? .. 

Comment by Mohammed Arif on October 26, 2017 at 12:15pm

आदरणीय निलेश जी,आदरणीय अफरोज़ सहर जी, आदरणीय शिज्जू शकूर जी, आदरणीय सौरभ पांडे जी आदाब,
मैंने अपना मंतव्य ग़ज़ल में ज़ियादा से ज़ियादा मौलिकता लाने के लिहाज से प्रकट किया था । मैं ग़ज़ल में पूर्ण मौलिकता का पक्षधर हूँ । सादर ।

Comment by Afroz 'sahr' on October 26, 2017 at 12:03pm
मोहतरम आरिफ़ साहिब इस विषय पर मेंरा मत जनाब सौरभ पांडे साहिब और जनाब शिज्जू शकूर साहिब के साथ है। सादर,,,

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