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2122 2122 2122
आग जलने पर धुआँ होगा बखूबी
रोशनी की हो नहीं लेकिन मनाही।1

क्यूँ अँधेरा साथ चलता है दियों के
पीटते हैं ढ़ोल की जाती मुनादी।2

गुल खिलाते हैं अँधेरे रोशनी में
और मिलती खूब उनको वाहवाही।3

आ गए कुछ दूर इतना मान भी लें
लग रहा है,हो रही अब भी दिहाड़ी।4

बँट गये हम 'वाद' के 'अवसाद' में बस
और जूठन छानती भूखी 'बुलाकी'।5
"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by Afroz 'sahr' on October 19, 2017 at 3:11pm
आदरणीय मनन कुमार जी इस रचना पर बहुत बहुत बधाई आपको,,,,,
Comment by Manan Kumar singh on October 19, 2017 at 12:07pm
आभार आदरणीय
Comment by Manan Kumar singh on October 19, 2017 at 12:03pm
आभार आदरणीय अजय जी।
Comment by Ajay Tiwari on October 18, 2017 at 6:33am

आदरणीय मनन कुमार जी,

अच्छी ग़ज़ल हुई है. शुभकामनाएं.

सादर 

Comment by Manan Kumar singh on October 16, 2017 at 9:48pm
आदरणीय समर साहिब,आदाब एवं आपका शुक्रिया।
Comment by Manan Kumar singh on October 16, 2017 at 9:46pm
आदरणीय सलीम भाई,आपका शुक्रिया।
Comment by Manan Kumar singh on October 16, 2017 at 9:46pm
आदरणीय आरिफ भाई,आपका शुक्रिया।
Comment by Samar kabeer on October 16, 2017 at 9:12pm
जनाब मनन कुमार सिंह जी आदाब,अपने ख़ास अंदाज़ में अच्छी ग़ज़ल कही आपने,बधाई स्वीकार करें ।
Comment by SALIM RAZA REWA on October 16, 2017 at 1:47pm
आ. मनन कुमार जी,
ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए मुबारक़बाद.
Comment by Mohammed Arif on October 16, 2017 at 10:31am
आदरणीय मनन कुमार जी आदाब, सामयिक ग़ज़ल । हर शे'र उम्दा । हार्दिक बधाई स्वीकार करें । बाक़ी गुणीजन अपनी राय देंगे ।

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