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अवशेष ...

गोली
बारूद
धुंआ
चीत्कार
रक्तरंजित
गर्द में
डूबा
अन्धकार
शून्यता
इस पार
शून्यता
उस पार
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हदों के
इस पार
हदों के
उस पार
बस
रहे शेष
अनुत्तरित प्रश्नों को
बंद पलकों में समेटे
क्षत-विक्षित
शवों के
ख़ामोश
अवशेष

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 534

Comment

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Comment by Sushil Sarna on October 7, 2017 at 7:33pm

आदरणीय  Mahendra Kumar  जी सृजन की गहनता को आत्मीय मान देने का दिल से आभार। 

Comment by Mahendra Kumar on October 6, 2017 at 9:03pm

युद्ध के औचित्य पर बहुत ही उम्दा कविता कही है आपने आ. सुशील सरना जी. इस उत्तम सृजन हेतु ढेर सारी बधाई स्वीकार कीजिए. सादर.

Comment by Sushil Sarna on October 6, 2017 at 12:50pm

आदरणीय शेख उस्मानी साहिब , आदाब। ... सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से आभार। नेट प्रॉब्लम के चलते आभार व्यक्त करने में विलम्ब हुआ , क्षमा चाहता हूँ।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on September 29, 2017 at 7:49pm
बहुत बढ़िया। चीखते, रोते शब्द; मार्मिक दृश्यांकन करते शब्द और पंक्तियां। सादर हार्दिक बधाई आदरणीय सुशील सरना जी।
Comment by Sushil Sarna on September 29, 2017 at 7:20pm

आदरणीय समर कबीर जी सृजन की गहनता को आत्मीय मान देने का दिल से आभार। 

Comment by Samar kabeer on September 28, 2017 at 8:36pm
जनाब सुशील सरना जी आदाब,बहुत उम्दा और मार्मिक कविता हुई है,इस प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।

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