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तृषित ज़िंदगी ...

तृषित ज़िंदगी ...

गाँव की
उदास और चुप शाम

टूटे छप्पर
हवाओं से
बिखरे तिनके
बयाँ कर रहे थे
ज़ुल्म आँधियों का

बिखरे 

रोटियों के टुकड़े
और
टूटे हुए मटके में
दो हाथों के इंतज़ार में
ठहरा
तृप्ति को तरसता
अतृप्त पानी
कह रहा था
चली गयी
शायद
कोई  ज़िंदगी

तृषित ही 

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 355

Comment

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Comment by Sushil Sarna on June 7, 2017 at 11:30am

आदरणीय  Mahendra Kumar साहिब सृजन को अपनी मधुर प्रशंसा से अलंकृत करने का हार्दिक आभार।

Comment by Mahendra Kumar on June 5, 2017 at 7:23pm

बढ़िया प्रस्तुति है आ. सुशील सरना जी. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. सादर.

Comment by Sushil Sarna on June 5, 2017 at 3:38pm

आदरणीया कल्पना भट्ट जी रचना के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से आभार। 

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on June 3, 2017 at 7:10am

बहुत सुंदर प्रस्तुति  आदरणीय सुशिल सरना जी हार्दिक बधाई |

Comment by Sushil Sarna on June 2, 2017 at 8:21pm

आदरणीय narendrasinh chauhan    जी सृजन के भावों को मान देने का हार्दिक आभार। 

Comment by narendrasinh chauhan on June 1, 2017 at 2:48pm

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति

Comment by Sushil Sarna on June 1, 2017 at 2:39pm

आदरणीय मो. आरिफ साहिब सृजन को अपनी मधुर प्रशंसा से अलंकृत करने का हार्दिक आभार।

Comment by Shyam Narain Verma on May 31, 2017 at 3:21pm

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति आदरणीय

सादर

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