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मैंने गलत को गलत कहा

ना कोई सगा रहा,
जिस दिन से होकर बेधड़क
मैंने गलत को गलत कहा!

तोहमतें लगने लगी,
धमकियां मिलने लगी,
हां मेरे किरदार पर भी
ऊंगलियां उठने लगी,
कातिलों के सामने भी
सिर नहीं मेरा झुका!
मैंने गलत को गलत कहा!

चापलूसों से घिरे
झाड़ पर वो चढ़ गये,
इतना गुरूर था उन्हें
कि वो खुदा ही बन गये,
झूठी तारीफें न सुन
हो गये मुझसे ख़फा!
मैंने गलत को गलत कहा!

मेरी सब बेबाकियों की
दी गई ज़ालिम सज़ा,
फांसी पे लटका दिया
बोले अब आया मज़ा,
है गलत जिसने गलत को
मौन होकर न सहा!
मैंने गलत को गलत कहा!

शिखा कौशिक नूतन

(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 875

Comment

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Comment by shalini kaushik on May 17, 2017 at 11:53pm
बहुत-बहुत सुंदर भाव अभिव्यक्ति शिखा कौशिक जी
Comment by shikha kaushik on May 17, 2017 at 9:41am
हार्दिक धन्यवाद विजय जी व महेंद्र जी
Comment by Mahendra Kumar on May 17, 2017 at 9:23am

आदरणीया शिखा जी, बढ़िया लगी आपकी कविता. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. सादर.

Comment by vijay nikore on May 16, 2017 at 1:38pm

सुन्दर भाव, सुन्दर अभिव्यक्ति। रचना के लिए हार्दिक बधाई।

Comment by shikha kaushik on May 15, 2017 at 8:28pm
नरेंद्र जी व सतविंद्र जी धन्यवाद हौसलाअफजाई के लिए
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on May 15, 2017 at 5:59pm
सुन्दरम् सुन्दरम् सुन्दरम्,हार्दिक बधाई आदरणीया!
Comment by narendrasinh chauhan on May 15, 2017 at 5:12pm

खूब सुन्दर रचना 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 15, 2017 at 10:40am

आ. शिखा जी , अच्छे विचार पिरोये हैं आपने , रचना के लिये हार्दिक बधाइयाँ ।

Comment by shikha kaushik on May 14, 2017 at 10:36pm
हार्दिक धन्यवाद समर कबीर जी
Comment by Samar kabeer on May 14, 2017 at 10:06pm
मोहतरमा शिखा कौशिक नूतन साहिबा आदाब,बहुत उम्दा जज़्बाती कविता लिखी आपने,दुनिया का यही दस्तूर है, सचं कहने वालों को फाँसी पर लटकाया जाता है,मुझे मेरा एक शैर याद आ गया,आपसे साझा करता हूँ ;-
'जितने झूटे थे वो महलों में हुए तख़्त नशीं
और जो सच्चे थे,सर-ए-दार हैं,तू जानता है'

इस शानदार प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।

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