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चार महारथी (लघुकथा)/शेख़ शहज़ाद उस्मानी

मोमबत्ती जलाते हुए एक व्यक्ति ने कहा-"लो हम भी निर्भया के नाम आज एक मोमबत्ती जला देते हैं उसकी मम्मी की तरह!"
"तो निर्भया और उसकी मम्मी के नाम हो जाये एक और जाम!" दूसरे व्यक्ति ने अगला पैग बनाते हुए कहा।"
"सालों को रेप और वो सब करना ही था, तो ऐसे करते कि फांसी की सज़ा न हो पाती! गये साल्ले काम से, फांसी की सज़ा कन्फर्म!" अख़बार का मुख्य पृष्ठ लहराते हुए तीसरे व्यक्ति ने नशे में कहा।
पांच साल पहले निर्भया नाम की युवती पर कुछ युवकों ने एक निजी बस में हमला कर निर्ममता से बलात्कार कर उसके अंग क्षत-विक्षत कर बस से नीचे फैंक दिया था। कुछ दिनों के बाद उस युवती की मृत्यु हो गई थी। क्रूर 'रेअरेस्ट ओफ रेअर केस' में आज सुप्रीम कोर्ट ने दोषियों की फांसी की सज़ा की पुष्टि कर दी थी।
शराब के नशे में चूर इन तीनों व्यक्तियों को अख़बार में छपे पूरे समाचार को पढ़कर सुनाते हुए चौथे व्यक्ति ने ठहाका लगाते हुए कहा- "हम चारों महारथी तो 'फैअरेस्ट ओफ फेअर' हैं, न हम ख़ुदक़ुशी करने की नौबत आने देते हैं, न किसी केस को फेस करके फांसी की सज़ा पाने की!"
"कर सब कुछ लेते हैं यारा!"
"अफेयर हो, रेप हो या हो 'कोई 'हनी ट्रैप', अगर हुस्न चाहिए, तो ख़ुद को बचाने का हुनर भी चाहिए,हा हा हा!"
नशीले स्वर में कक्ष में ये शब्द गूंजते रहे और पैग पर पैग लेते हुए उद्योग जगत, फ़िल्म जगत, राजनीति और धनाढ्य वर्ग के चारों उन्मुक्त व स्वच्छंद यौन-शोषण अपराधी ख़ुद को महारथी कहते गये।

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on May 20, 2017 at 5:29pm
रचना पर समय देकर अनुमोदन व हौसला अफजाई के लिए सादर हार्दिक धन्यवाद आदरणीय महेन्द्र कुमार जी । बढ़िया सुझाव। शीर्षक चयन में इतना विवेक काम नहीं कर पा रहा है।
Comment by Mahendra Kumar on May 15, 2017 at 9:43am

वाह! क्या ज़बरदस्त लघुकथा हुई है आदरणीय शेख़ शहजाद उस्मानी जी. आपके इस कथानक से मैं भी पूरी तरह इत्तेफ़ाक रखता हूँ. इस शानदार लघुकथा के लिए दिल से ढेर सारी बधाई स्वीकार कीजिए. शीर्षक को ले कर एक सुझाव है कि इसे "चार महारथी" की जगह केवल "महारथी" ही रखा जाए. ऐसा करने से इस रचना का फलक और भी ज्यादा बढ़ जाएगा. सादर. 

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on May 7, 2017 at 1:35pm
मेरे इस रचना पटल पर समय देकर अपनी राय से अवगत करा कर मेरे इस नवीन प्रयास की प्रशंसा कर मुझे प्रोत्साहित करने के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरम जनाब डॉ. चन्द्रेश कुमार छतलानी साहब, जनाब बसंत कुमार शर्मा जी व जनाब सतविंदर कुमार राणा साहब।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on May 7, 2017 at 1:35pm
मेरे इस रचना पटल पर समय देकर अपनी राय से अवगत करा कर मेरे इस नवीन प्रयास की प्रशंसा कर मुझे प्रोत्साहित करने के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरम जनाब डॉ. चन्द्रेश कुमार छतलानी साहब, जनाब बसंत कुमार शर्मा जी व जनाब सतविंदर कुमार राणा साहब।
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on May 7, 2017 at 9:44am
उत्तम अभिव्यक्ति हुई है आदरणीय शेखशाहज़ाद जी।हार्दिक बधाई
Comment by बसंत कुमार शर्मा on May 7, 2017 at 9:37am

गज़ब की अभिव्यक्ति , वाह आदरणीय  Sheikh Shahzad Usmani जी 

Comment by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on May 6, 2017 at 7:03pm

बहुत ही बढ़िया रचना कही है आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी साहब, अपराध कर के जो पकड़ा जाये वो अपराधी और जो बच जाये वो महारथी| सादर बधाई स्वीकार करें इस रचना के सृजन हेतु| 

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on May 6, 2017 at 1:22pm
त्वरित प्रतिक्रिया व राय दे कर प्रोत्साहित करने के लिए सादर हार्दिक धन्यवाद मुहतरम जनाब मोहम्मद आरिफ साहब व जनाब डॉ. आशुतोष मिश्रा साहब।
जी, बिल्कुल मंच के नियमानुसार कोई भी रचना साझा कर (रचनाकार के नाम सहित) उसे प्रोत्साहित किया जा सकता है।
.
Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 6, 2017 at 1:07pm
आदरणीय शेख जी लघु कथा के बिषय में तो मुझे बहुत जानकारी नहीं हैं आपकी रचनाओं को पढ़ कर इस विधा से जुडाव हुआ है आपकी बेहतरीन रचनाएँ पढी हैं लेकिन यह रचना मुझे सर्वाधिक पसंद आयी ..क्या ही शानदार तरीके से आपने इतनी बड़ी बात को इस माध्यम से कहा है आपकी अनुमति हो तो मैं इसे अपने व्हाट्स एप ग्रुप पर हूबहू आपके नाम के साथ पोस्ट करना चाहता हूँ ..रचना पर एक बार फिर ढेरों ढेरों शुभकामनाएं सादर
Comment by Mohammed Arif on May 6, 2017 at 12:12pm
बहुत ख़ूब!बहुत ख़ूब!!बहुत ही सामयिक , ज्वलंत लघुकथा । यह हमारे समाज की सोच को भी दर्शाती है । इस लघुकथा ने सबकुछ कह दिया । बेहतरीन कथानक । ढेरों बधाईयाँ स्वीकार करें ।

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