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ग़ज़ल....रही माँ पूछती आँसू बहा कर

1222 1222 122


मिलेगा क्या तुम्हें परदेश जा कर
रही माँ पूछती आँसू बहा कर

तड़पता छोड़कर तन्हा शजर को
परिंदा उड़ गया पर फड़फड़ा कर

बहल जाये विकल मासूम बचपन
नजर भर देख ले माँ मुस्कुरा कर

है पल पल टूटती साँसों की माला
बिता लो चार पल ये हँस हँसा कर

न जाओ छोड़कर 'ब्रज' कुंज गलियाँ
दरख्तों ने कहा ये कसमसा कर

.
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 31, 2017 at 8:02pm
आदरणीय रवि शुक्ला जी आदरणीय समर सर..आप बड़े इंगित कर रहे हैं तो निश्चय ही अटकाव होगा आदरणीय समर सर के बताये अनुसार सुधार करता हूँ..दरअसल आदरणीय मतले के पीछे जो मेरी सोच है.."मिलेगा क्या तुम्हें परदेश जा कर,रही माँ पूँछती आँसू बहा कर"अर्थात व्यक्ति जा चूका माँ पूँछती ही रह गई..थोडा भूतकाल का भाव है.."यही माँ पूँछती आँसू बहा कर" से वर्तमान का भाव निकल के आ रहा है..अर्थात व्यक्ति जाने की तैयारी कर रहा है और माँ रोक रही है..लेकिन अग्रज कह रहे हैं तो कुछ कमी अवश्य होगी..सादर
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 31, 2017 at 6:40pm
आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' जी रचना पटल पे आपके अमूल्य समय एवं उत्साहवर्धक टिप्पड़ी के लिए बारम्बार अभिनन्दन एवं आभार..सादर
Comment by Ravi Shukla on March 31, 2017 at 10:49am

आदरणीय ब्रजेश जी सुन्‍दर गजल कही आपने मतले के सानी पर हम भी अटके थे वाक्‍य विन्‍यास की दृष्टि से मिसरा सही नहीं हो रहा था । आदरणीय समर साहब की इस्‍लाह कारगर है । मकते में आपका नाम बहुत खुबसूरती के साथ आया है बहुत बहुत बधाई ।

Comment by नाथ सोनांचली on March 29, 2017 at 7:30am
आदरणीय बृजेश कुमार ब्रज जी सादर अभिवादन, बहुत खूबसूरत और दिल को छूती गजल, मतला और दूसरा शैर तो पढ़कर विभोर हो गया, दाद के साथ मूबरकबाद कबूल फरमायें
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 28, 2017 at 10:39pm
आदरणीय समर कबीर जी प्रणाम..हमेशा की तरह आपकी विस्तृत समीक्षात्मक टिप्पड़ी मनोवल बढ़ाने वाली और नए पाठ सिखाने वाली है..आपके बताये अनुसार सुधार करता हूँ..
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 28, 2017 at 10:35pm
रचना पटल पे आपका हार्दिक अभिनन्दन है आदरणीय मनोज कुमार अहसास जी..सादर
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 28, 2017 at 10:34pm
आदरणीय सुशील सरना जी रचना को ह्रदय से महसूस करने के लिए अंतस की गहराइयों से आभार व्यक्त करता हूँ..सादर
Comment by Samar kabeer on March 28, 2017 at 9:34pm
जनाब बृजेश कुमार'ब्रज'साहिब आदाब,उम्दा ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
मतले का सानी मिसरा यूँ कर लें तो गेयता बहतर हो जायेगी:-
'यही माँ पूछती आँसू बहा कर'

दूसरे शैर के ऊला मिसरे में 'तड़फता'को "तड़पता"कीजिये ।
Comment by मनोज अहसास on March 28, 2017 at 4:18pm
Bahut khub
Sadar badhai
Comment by Sushil Sarna on March 28, 2017 at 2:55pm

मिलेगा क्या तुम्हें परदेश जा कर
रही माँ पूछती आँसू बहा कर

तड़फता छोड़कर तन्हा शजर को
परिंदा उड़ गया पर फड़फड़ा कर

वाह आदरणीय बृजेश जी बहुत ही गहन भाव का दिलकश प्रस्तुतीकरण। ... हार्दिक बधाई।

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