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मन शायद अपना अस्तित्व टटोल रहा है // डॉ० प्राची

फिर बिसरी यादों के पन्ने खोल रहा है,
मन शायद अपना अस्तित्व टटोल रहा है।

गुमसुम गुपचुप ठिठकी सी खिड़की ने अपनी
छोड़ी सकुचाहट भर ली जी भर अँगड़ाई,
रेशम पर बिखरे फूलों ने सिलवट-सिलवट
आहिस्ता से रीत मोहब्बत की दोहराई,

सुध-बुध बिसराए मुस्कानें ओढ़े तन पर
करवट-करवट क्यों मदमाता डोल रहा है?
मन शायद...

रुकी-रुकी पलकों पर दी सपनों ने दस्तक
रुँधे कण्ठ ने आस गीत गाए फिर गुनगुन,
फिर बाँधे मन्नत के धागे मंदिर-मंदिर
कोमल एहसासों के सब ताने-बाने बुन,

नया सवेरा जादू वाली खोल पोटली
बेला-जूही फिर साँसों में घोल रहा है।
मन शायद...

सोने का दीवट था घी से भरा लबालब
आख़िर क्यों लौ जीवन से फिर भी हारी थी,
आँधी-तूफानों का डर था या ठिठुरन थी
आख़िर कौन समझता कैसी लाचारी थी,

महलों की दीवारों से टकराकर बिखरा
हर क्रन्दन इंगित में सब सच बोल रहा है।
मन शायद...

टाट-टाट मटमैले धूल सने रिश्तों पर
उम्मीदों का मख़मल आख़िर कब तक मढ़ना,
लाख मुखौटे ओढ़े हों चाहे दुनिया ने
सीख चुका मन अब सच्चे चेहरों को पढ़ना,

दर्द भरी आँखों से दिल पर रख कर पत्थर
हर जर्जर बन्धन की गिरहें खोल रहा है।
मन शायद...

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by Dr Ashutosh Mishra on February 9, 2017 at 11:56am

आदरणीया प्राची जी ..पढने में अति सुंदर लगा ..इस शानदार गीत के लिए बधाई / 

गुमसुम गुपचुप ठिठकी सी खिड़की ने अपनी
छोड़ी सकुचाहट भर ली जी भर अँगड़ाई,
रेशम पर बिखरे फूलों ने सिलवट-सिलवट
आहिस्ता से रीत मोहब्बत की दोहराई,....एक निवेदन है इन पंक्तियों को मैं पूरी तरह समझ नहीं पा रहा हूँ ..आप इन पंक्तियों को समझने में मेरी मदद करें ..ऐसी तमाम गहन रचनाओं में आदरणीय सौरभ सर मुझ जैसे अल्प जानकारों की मदद अपनी गहन प्रतिक्रीय से कर देते हैं जिससे गहन रचनाओं को समझने में मदद के साथ चिंतन को दिशा मिलती है / सर की बिस्तृत प्रतिक्रिया के न होने के कारण आपसे निवेदन है  सादर 

Comment by अलका 'कृष्णांशी' on February 5, 2017 at 1:26pm

आदरणीया प्राची जी, बधाई इस बेहतरीन रचना के लिए| सादर 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on February 4, 2017 at 11:18pm
गीत की सहजता पर आपके अनुमोदन के लिए सादर धन्यवाद आदरणीय सौरभ जी

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 4, 2017 at 11:02pm

कमाल ! कमाल !!

प्रस्तुति के कथ्य में वैचारिक ऊहापोह जिस तरह से उभर कर आया है, वह कई तरह के भाव-उद्बोधन का कारण बन रहा है. सुगढ़ किन्तु सहज प्रस्तुति पर हृदयतल से बधाइयाँ स्वीकारें, आदरणीया प्राचीजी. 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on February 4, 2017 at 10:14pm

प्रस्तुत गीत पर आप सबके उत्साहवर्धक अनुमोदन के लिए सादर धन्यवाद आ० समर कबीर जी, आ० मोहम्मद आरिफ जी, आ० सतविन्द्र कुमार जी, आ० इंद्रा विद्या वाचस्पति तिवारी जी , और आ० लक्ष्मण धामी जी 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 3, 2017 at 11:47am

आ. प्राची बहन , सनडर गीत रचना हुई है हार्दिक बधाई .

Comment by indravidyavachaspatitiwari on February 3, 2017 at 7:52am

डा0 प्राची सिह जी आपने सच ही कहा हैः-
टाट-टाट मटमैले धूल सने रिश्तों पर
उम्मीदों का मखमल आखिर कब तक मढ़ना,
लाख मुखौटे ओढ़े हों चाहे दुनिया ने
सीख चुका मन अब सच्चे चेहरों को पढ़ना,
दर्द भरी आँखों से दिल पर रख कर पत्थर
हर जर्जर बन्धन की गिरहें खोल रहा है।
मन को छू लेने वाली व समझदार बनाने वाली रचना के हार्दिक बधाईण्

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on February 3, 2017 at 7:50am
आदरणीया प्राची जी सादर वन्दन! ,मुग्ध करता हुआ गीत हुआ है,हार्दिक बधाई!
Comment by Mohammed Arif on February 2, 2017 at 9:44pm
आदरणीया प्राची साहिबा आदाब , अच्छी रचना के लिए बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Samar kabeer on February 2, 2017 at 2:49pm
मोहतरमा डॉ.प्राची सिंह साहिबा आदाब,उम्दा गीत लिखा आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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