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पकड़कर हाथ राधा का चले जो नूर का बेटा (फिल्बदीह ग़ज़ल 'राज '

पड़े आफ़ात तो छुपता किसी मशहूर का बेटा 
कलेजा शेर का रखता मगर मजदूर का बेटा 

कहीं ऊपर जमीं के उड़ रहा मगरूर का बेटा 
जमीं को चूमता चलता किसी मजबूर का बेटा

कई तलवार बाहर म्यान से आती दिखाई दें  
पकड़कर हाथ राधा का चले  जो नूर का बेटा

सिखाने पर परायों के भरा है जह्र नफरत का 
चला हस्ती मिटाने को कोई अखनूर का बेटा

कदम पीछे हटा लेता जहाँ उसकी जरूरत हो 
हर इक रहबर फ़कत कहने को है जम्हूर का बेटा 

सरापा थाम लेती है तुम्हें अंगूर की बेटी 
अगर होता तो क्या देता तुम्हें अंगूर का बेटा 

हुनर में डूब कर उसके कलम करता ग़ज़ल गोई 
ग़ज़ल में नाम उसका लिख दिया संतूर का बेटा

--------मौलिक एवं अप्रकाशित 

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 27, 2016 at 8:11pm

आद० गंगाधर शर्मा जी, आपको ग़ज़ल पसंद आई आपकी जर्रानवाजी का तहे दिल से शुक्रिया | 

Comment by Ganga Dhar Sharma 'Hindustan' on August 27, 2016 at 7:00pm

आदरणीया ....बहुत बढ़िया गज़ल के लिये बधाई...

कई तलवार बाहर म्यान से आती दिखाई दें  
पकड़कर हाथ राधा का चले  जो नूर का बेटा...........कमाल ....बिल्कुल ठीक....वाह...


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 27, 2016 at 6:45pm

आद०  ब्रिजेश कुमार ब्रज जी ,आपको ग़ज़ल पसंद आई आपका तहे दिल से बहुत बहुत शुक्रिया |

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on August 27, 2016 at 2:00pm

क्या बात क्या बात....बहुत ही शानदार ग़ज़ल सादर बधाई आदरणिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 26, 2016 at 9:59am

आद० प्रतिभा पाण्डेय जी,ग़ज़ल पर होंस्लाफाई करती आपकी दाद  सर आँखों पर | कभी अखनूर शह्र दंगे फसाद के लिए अधिकतर चर्चा में रहता था | सच बात तो ये है की कश्मीर के युवा बाहरी ताकतों से बरगलाए जा रहे हैं ये स्थिति सोचनीय है आज कल के हालात भी दुखदाई हैं मेरा कश्मीर कई बार आना जाना हुआ वहाँ की अवाम से रूबरू हुई उनके विचार जाने कोई परिवार नहीं चाहता दंगे फसाद किन्तु उनको लालच ले डूबता है | अपने विचार साझा  करने का बहुत बहुत शुक्रिया |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 26, 2016 at 9:53am

आद० डॉ. आशुतोष जी,आपसे मिली दाद हमेशा तोषकारी होती है उत्साह वर्धन होता है आपका तहे दिल से बहुत- बहुत शुक्रिया|   


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 26, 2016 at 9:51am

आद० धर्मेन्द्र जी,ग़ज़ल पर आपकी दाद मिली ग़ज़ल धन्य हो गई आपका तहे दिल से शुक्रिया | 

Comment by pratibha pande on August 26, 2016 at 9:24am


कई तलवार बाहर म्यान से आती दिखाई दें  
पकड़कर हाथ राधा का चले  जो नूर का बेटा.....वाह 

 सिखाने पर परायों के भरा है जह्र नफरत का 
चला हस्ती मिटाने को कोई अखनूर का बेटा....i अखनूर शब्द ने बहुत सारी यादें ताज़ा कर दीं ,तीन साल वहां रही हूँ

बहुत खूबसूरत ग़ज़ल ,ढेरों बधाई स्वीकार करें आदरणीया राजेश जी  


Comment by Dr Ashutosh Mishra on August 25, 2016 at 3:36pm

आदरणीया राजेश जी ..आपकी ये ग़ज़ल तो बिलकुल अलग अंदाज में है ..नूर का बेटा ..अखनूर का बे टा  ..ये प्रयोग बहुत पसंद आये ..अखनूर का बे टा आपकी चर्चा के दौरान जान सका ..बेहद शानदार ग़ज़ल के लिए ढेर सारी बधाई स्वीकार करिए सादर प्रणाम के साथ 

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on August 25, 2016 at 11:51am

बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है आदरणीया  राजेश कुमारी जी, दाद कुबूल करें

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