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बहुत डरता है ......

बहुत डरता है ......

बहुत डरता है
मनुष्य अपने जीवन के
क्षितिज को देखकर
अपनी आकांक्षाओं के
असीमित आकाश में
जीवन के
सूक्ष्म रूप को देख कर
कल्प को अल्प
बनता देखकर

सच ! बहुत डरता है
मुखौटों को जीने से

थक जाता है 
संवदनाओं के
आडंबर के बोझ ढोने से

हार जाता है 
दुनिया के साथ जीते जीते
डर जाता है
हृदय की गहन कंदराओं में
अपने ही अस्तित्व की
मौन उपस्थिति से

हाँ ! बहुत डरता है
मनुष्य
अपने आरम्भ की
दीर्घ राह का
अंतिम छोर देखकर
जीवन की पगडंडियों का
अंतिम मोड़ देखकर
निर्जीव देह पर
दुनियावी मुखौटों का
दिखावटी विलाप देखकर

उफ्फ !
ये हर पल डरता मनुष्य
क्यों यथार्थ को
नहीं जी पाता

काया को जीते जीते 

आकांक्षाओं की अग्नि में
देह के संग संग
ये स्वयं भी
अपने यथार्थ के साथ
चिरनिद्रा में
सो जाता है


सुशील सरना
मौखिक एवं अप्रकाशित

Views: 461

Comment

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Comment by Sushil Sarna on August 11, 2016 at 1:40pm

आदरणीय  गिरिराज भंडारी     जी आपके आत्मीय स्नेह से रचना उपकृत हुई। आपकी सूक्ष्म दृष्टि का दिल से आभार। पढ़ने के बाद भी टंकण त्रुटि रह गयी।  अभी दुरुस्त किये देता हूँ। तहे दिल से आपका शुक्रिया। 

Comment by Sushil Sarna on August 11, 2016 at 1:37pm

आदरणीय  सुरेश कुमार 'कल्याण   जी आपके आत्मीय स्नेह से रचना उपकृत हुई। तहे दिल से आपका शुक्रिया। 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 11, 2016 at 12:50pm

आदरणीय सुशील भाई , अच्छी लगे आपकी वैचारिक प्रस्तुति , हार्दिक बधाई ।

अस्तितिव    को  अस्तित्व  कर लीजियेगा

Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on August 11, 2016 at 12:35pm
आदरणीय श्री सुशील सरना जी बहुत ही सुन्दर भावाभिव्यक्ति हुई है । इन्सान के स्वभाव को बहुत सुंदर उकेरा है । बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Sushil Sarna on August 10, 2016 at 6:31pm

आदरणीय  Harash Mahajan    जी  प्रस्तुति में निहित भावों को आत्मीय सम्मान देने का दिल से आभार। 

Comment by Harash Mahajan on August 10, 2016 at 5:02pm

आ० Sushil Sarna  जी बहुत ही सुंदर पेशकश !!

"बहुत डरता है
मनुष्य अपने जीवन के
क्षितिज को देखकर"

साभार !!

Comment by Sushil Sarna on August 10, 2016 at 12:49pm

आदरणीय  Dr. Vijai Shanker    जी  प्रस्तुति में निहित भावों को आत्मीय सम्मान देने का दिल से आभार। 

Comment by Dr. Vijai Shanker on August 10, 2016 at 10:36am
जीवन के क्षितिज और अपनी आकांशाओं के वशीभूत डरता हुआ मनुष्य। बहुत सुन्दर वर्णन , बहुत बहुत बधाई , आदरणीय सुशील सरना जी , सादर।

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