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ग़ज़ल -- बह्र-ए-शिकस्ता में एक प्रयास (मिथिलेश वामनकर)

फ़'इ'लात फ़ाइलातुन फ़'इ'लात फ़ाइलातुन (बह्र-ए-शिकस्ता)

1121 - 2122 - 1121 - 2122

 

मेरे नाम से न चाहे तू अगर तो मत सदा दे  

मुझे देख के मगर तू, कभी हाथ तो हिला दे

 

मैं यहाँ पढूँ वजीफा- कोई आशियाँ न उजड़े

तू वहाँ किसी गली को कोई पुरअसर दुआ दे

 

कभी वसवसा रहा हूँ कभी मुब्तला रहा हूँ

दे सुकून की दुशाला, मुझे चैन की कबा दे

 

यहाँ अपने आप से मैं रहा बेखबर हमेशा

मैं मशीन हो गया हूँ मुझे आदमी बना दे

 

अभी लौट के जो देखा मेरा गाँव खो गया है

न मिला कोई गले से, न कोई मुझे सदा दे

 

जो नसीब में है कासा तो गुमान क्यों ज़रा सा

ये हुनर नहीं है मुझमें, मुझे माँगना सिखा दे

 

तू अगर ख़ुदा नहीं तो मेरा नाख़ुदा ही बन जा

मुझे जिस्म मिल गया है मुझे रूह का पता दे

 

यहाँ रात ढल रही है, कोई तीन बज रहा है

नया शेर हो सहर तक मुझे फलसफा नया दे

 

ये तबाह ज़ार आलम कई गिद्ध शादमां हैं

कि हलाक देख दिल्ली, उसे कोई आसरा दे  

 

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(मौलिक व अप्रकाशित)  © मिथिलेश वामनकर 
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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 6, 2015 at 9:59pm
आदरणीय दिनेश भाई ग़ज़ल की सराहना के लिए हार्दिक आभार।
Comment by दिनेश कुमार on May 6, 2015 at 7:57pm
बेहतरीन ग़ज़ल हुई है भाई मिथिलेश जी। वाह वाह वाह, क्या कहने। ढेरों दाद

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 6, 2015 at 6:03pm

आदरणीय बड़े भाई धर्मेन्द्र जी आपकी सराहना और उत्साहवर्धक सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 6, 2015 at 6:03pm

आदरणीय नीलेश जी आपकी आत्मीय सराहना और सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 6, 2015 at 5:57pm

आदरणीय कृष्ण भाई जी ग़ज़ल की सराहना और उत्साहवर्धक सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार 

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 6, 2015 at 3:38pm

अच्छी ग़ज़ल हुई है आ. मिथिलेश जी, दाद कुबूल कीजिए

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 6, 2015 at 11:04am

बहुत खूब ..वाह वाह वाह ...क्या कहने मिथिलेश भाई ..
ललगालगा लगागा ///// ललगालगा लगागा...जो लय पकड़ी तो छोडी ही नहीं ..बहुत खूब...
ईश्वर करे आप तीन नहीं चार-पाँच बजे तक जागते रहें और हमें ऐसी ग़ज़ले नवाज़ते रहे ..

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on May 6, 2015 at 10:22am

यहाँ अपने आप से मैं रहा बेखबर हमेशा

मैं मशीन हो गया हूँ मुझे आदमी बना दे    वाह वाह बेहतरीन!

 

अभी लौट के जो देखा मेरा गाँव खो गया है

न मिला कोई गले से, न कोई मुझे सदा दे      लाजव़ाब! और सच अब गाँव  में भी पहले सा अपनापन नही मिलता!

आदरणीय मिथिलेश सर कमाल की गजल हुयी है!दिली दाद व् मुबारकबाद कबूल करें!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 6, 2015 at 4:03am

आदरणीय वीनस भाई जी आपकी शेर दर शेर समीक्षा पाकर थोड़ा सा आश्वस्त हुआ हूँ. बहुत दिनों से इस ग़ज़ल पर काम कर रहा था. काफ़ी बदलाव किये, कहन को सरल करने का पूरा प्रयास किया. फिर भी गलतियाँ हो ही गई. सच में  ग़ज़ल एक बार उस्ताद के हाथों से जरुर गुजरनी चाहिए.... आपने जो मार्गदर्शन दिया है उसके अनुसार संशोधन कर रहा हूँ. ग़ज़ल को समय देने और अमूल्य मार्गदर्शन के लिए हृदय से आभारी हूँ. 

रचनाप्रक्रिया के क्रम को शेर की शक्ल देने का प्रयास कर रहा था उसी क्रम में सवा तीन बजे वाला शेर लिखा है ... इसे भी सुधारने का प्रयास करता हूँ. सादर  


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 6, 2015 at 3:51am

आदरणीय डॉ विजय शंकर सर सराहना और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार 

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