For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

धुंध का परदा हटाओ - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

2122    2122    2122    212
*******************************
झील के पानी  को  फिर से बादलों ताजा करो
नीर हो  झरते  रहो तुम मत कभी ठहरा करो
***
सिर्फ गर्जन  के लिए  कब  धूप जनती है तुम्हें
प्यास  खेतों  की  बुझाओ  खेल  से  तौबा करो
***
जान का भय  किसलिए है परहितों की बात जब
धुंध  का  परदा   हटाओ   दूर   तक   देखा   करो
***
सूर्य  के  तुम  वंशजों  में  छोड़   दो  मायूसियाँ
त्याग दो  जीवन भले ही तम को मत पूजा करो
***
यूँ अँधेरों की  तिजारत  करके हासिल क्या हुआ
होश  में   आओ  जरा   अब   रौशनी  बाँटा करो
**
मौलिक और अप्रकाशित

Views: 586

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 8, 2015 at 12:44pm

आ0 प्रबुद्ध जानो का ग़ज़ल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए कोटि कोटि धन्यवाद . आशा है स्नेह बनाए रखेंगे 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 26, 2015 at 7:42pm

सुन्दर सार्थक ग़ज़ल लिखी है बहुत बढ़िया ...हार्दिक बधाई आ० लक्ष्मण भैया 

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on February 26, 2015 at 7:17pm

बहुत सुन्दर रचना सन्देश के साथ ...अभिनन्दन आपका धामी साहब!

Comment by khursheed khairadi on February 26, 2015 at 9:57am

यूँ अँधेरों की  तिजारत  करके हासिल क्या हुआ
होश  में   आओ  जरा   अब   रौशनी  बाँटा करो

आदरणीय लक्ष्मण सर ,उम्दा ग़ज़ल हुई है |हार्दिक बधाई स्वीकार करें साहब |मतला काफ़ी पसंद आया साहब ,,सादर अभिनन्दन |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 25, 2015 at 10:37pm

आदरनीय लक्ष्मण भाई , बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है , हर शे र मे एक संदेश है । आपको हार्दिक बधाई ॥ आ. मिथिलेश भाई की बात से मै भी सहमत हूँ , एक बार सोच लीजियेगा ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 25, 2015 at 7:36pm
आदरणीय लक्ष्मण धामी सर जी उम्दा ग़ज़ल हुई है । शेर दर शेर दिल से दाद कुबूल फरमाये।
सभी अशआर बेहतरीन हुए है। एक निवेदन यदि आपको उचित लगे तो...

सूर्य के तुम वंशजों सब छोड़ दो मायूसियाँ।
में के स्थान पर सब। सादर।
Comment by Sushil Sarna on February 25, 2015 at 7:22pm

यूँ अँधेरों की तिजारत करके हासिल क्या हुआ
होश में आओ जरा अब रौशनी बाँटा करो .... वाह आदरणीय वाह क्या गज़ब की बात कह गए .... सलाम आपकी कलम और कल्पना को … हार्दिक बधाई कबूल फरमाएं सर।

Comment by maharshi tripathi on February 25, 2015 at 6:10pm

एक और उम्दा गजल पर आपको पुनः बधाई आ, मुसाफिर जी |

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 25, 2015 at 4:49pm

धामी जी

आपकी गजल  मुझे बहुत अच्छी लगी i सादर i

Comment by Pari M Shlok on February 25, 2015 at 2:44pm
यूँ अँधेरों की तिजारत करके हासिल क्या हुआ
होश में आओ जरा अब रौशनी बाँटा करो

सूर्य के तुम वंशजों में छोड़ दो मायूसियाँ
त्याग दो जीवन भले ही तम को मत पूजा करो

सुन्दर ग़ज़ल..... आदरणीय लक्षमण धामी जी.. बधाई

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
1 hour ago
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"क्षमा कीजियेगा 'मुसाफ़िर' जी "
14 hours ago
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला आपकी…"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। भाई रवि जी की सलाह से यह और निखर गयी है । हार्दिक…"
yesterday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
yesterday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212  22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में क्या से क्या हो गए महब्बत में मैं…"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"  आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी   "
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा एकादश. . . . . पतंग
"आदरणीय सुशील सरनाजी, पतंग को लगायत दोहावलि के लिए हार्दिक बधाई  सुघड़ हाथ में डोर तो,…"
yesterday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय रवि भसीन 'शहीद' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला ग़ज़ल तक आए और हौसला…"
Wednesday
Sushil Sarna posted blog posts
Tuesday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय Jaihind Raipuri जी,  अच्छी ग़ज़ल हुई। बधाई स्वीकार करें। /आयी तन्हाई शब ए…"
Tuesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on रामबली गुप्ता's blog post कर्मवीर
"कर्मवीरों के ऊपर आपकी छांदसिक अभिव्यक्ति का स्वागत है, आदरणीय रामबली गुप्त जी.  मनहरण…"
Tuesday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service