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आह ! वह सुख ----

पावसी मेह  में भीगा हुआ चंद्रमुख I

यौवन की दीप्ति से राशि-राशि  सजा 

जैसे प्रसन्न उत्फुल्ल नवल नीरजा I  

 

मुग्ध लुब्ध दृष्टि ----

सामने सदेह सौंदर्य एक सृष्टि I

अंग-प्रत्यंग प्रतिमान में ढले

ऐसा रूप जो ऋतुराज को छले  I

 

नयन मग्न नेत्र------

हुआ क्रियमाण कंदर्प-कुरुक्षेत्र I

उद्विग्न  प्राण इंद्रजाल में फंसे

पंच कुसुम बाण पोर-पोर में धंसे I

 

वपु धवल कान्त -----

अंतस में हा-हा वृत्ति, बहिरंग शांत  I

लज्ज -कंप भाव अनुराग से सने

अर्ध मुकुल नैनों में स्वप्न थे घने  I

 

रूप अपरूप -----

मंदिर के दीप की वर्तिका अनूप  I

दशक पूर्व जैसा ताप जैसा था प्रकाश I

आज भी वही अतृप्ति और वही प्यास I

 

एक चिर सत्य -----

भाव की सजीवता सदैव ही अमर्त्य  I

कुछ भी अतीत से नहीं अधिक समृद्ध

स्मृति  में कभी  नहीं नेह होता वृद्ध  I

 

मौलिक व् अप्रकाशित

 

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Comment

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Comment by Neeraj Neer on November 25, 2013 at 8:50am

वाह आदरणीय .. अनुपम कृति .. अत्यंत मधुर भाव और उतने ही सुन्दर शब्द प्रयोग.. पावसी मेह  में भीगा हुआ चंद्रमुख.. इस प्रथम पंक्ति ने ही पूरी कविता की रूप रेखा तय कर दी जैसे .. बहुत उत्तम .. साधुवाद ..

Comment by विजय मिश्र on November 23, 2013 at 5:45pm
स्मृति की अद्भुत बिशेषता का सर्वश्रेष्ठ उपसंहार अपने अद्भुत शब्द सामर्थ्य से किया आपने| शब्द सज्जा एवं भाव की दृष्टि से रचना अतिविशिष्ट और प्रगाढ़ है | सादर ,गोपालजी !
Comment by अरुन 'अनन्त' on November 23, 2013 at 4:12pm

वाह वाह वाह आदरणीय अनुपम रचना अत्यंत मधुर गहन भाव पिरोये अप्रितम प्रस्तुति हेतु ह्रदय से हार्दिक बधाई स्वीकारें.

Comment by ram shiromani pathak on November 22, 2013 at 11:51pm

वाह आदरणीय अनुपम शब्द संयोजन , बहुत ही  सुन्दर प्रस्तुति । …हर्दिक बधाई आपको। । सादर 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on November 22, 2013 at 11:23pm

बेहद सुंदर भावनाओं के साथ, उत्कृष्ट रचना बधाई स्वीकारें आदरणीय डा. गोपाल जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on November 22, 2013 at 10:59pm

बहुत खूबसूरत रचना आदरणीय डॉ गोपाल सर, इस कामयाब रचना के लिये आपको बधाई

Comment by Meena Pathak on November 22, 2013 at 6:21pm

आदरणीय गोपाल जी सुन्दर रचना हेतु बधाई स्वीकारें | सादर 

Comment by वेदिका on November 22, 2013 at 6:15pm

 

एक चिर सत्य -----

भाव की सजीवता सदैव ही अमर्त्य  I

कुछ भी अतीत से नहीं अधिक समृद्ध

स्मृति  में कभी  नहीं नेह होता वृद्ध  I

बहुत खूबसूरत चतुष्पदी है, सजीव खयालात  हैं और नेह के वृद्ध न होने का प्रसंग बेहद मर्मस्पर्शी हुआ है!

बधाई आ० गोपाल जी! 

Comment by नादिर ख़ान on November 22, 2013 at 5:24pm

एक चिर सत्य -----

भाव की सजीवता सदैव ही अमर्त्य  I

कुछ भी अतीत से नहीं अधिक समृद्ध

स्मृति  में कभी  नहीं नेह होता वृद्ध ......

सच ही तो है ....सुंदर प्रस्तुति ।

Comment by annapurna bajpai on November 22, 2013 at 5:10pm

आदरणीय गोपाल कृष्ण जी अद्भुत रचना , हर शब्द जैसे जीवंत हो गया है , बधाई आपको । 

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