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ग़ज़ल "दरमियाने इश्क जब दुश्वारियां आने लगीं"

 

दरमियाने इश्क जब दुश्वारियां आने लगीं

एक दूजे में नज़र सौ खामियाँ आने लगीं

मैं ये सोचे हूँ कि कोई याद मुझको भी करे  
तुम परेशां हो कि फिर से हिचकियाँ आने लगीं

 

माँ का दामन है या है मेरा बिछौना मखमली

गोद में जाते ही मीठी झपकियाँ आने लगी

 

हम अकेले रो रहे थे अपने दिल के जख्म पर

और हमारा साथ देने सिसकियाँ आने लगीं

 

इश्क के झोंके फरेबी खुश्बुओं से क्या मिले

“दीप” फिर नफ़रत भरी कुछ आँधियाँ आने लगीं

  

 

संदीप पटेल “दीप”

 

 

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Comment by Ashok Kumar Raktale on May 20, 2013 at 11:29pm

माँ का दामन है या है मेरा बिछौना मखमली

गोद में जाते ही मीठी झपकियाँ आने लगी..........वाह! बहुत ही उम्दा शेर.

आदरणीय संदीप जी बहुत ही सुन्दर गजल कही है सभी अशआर सुन्दर है बहुत बहुत बधाई स्वीकार करें.

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on May 16, 2013 at 3:20pm

आदरणीया शालिनी जी , राम भाई , आदरणीय प्रदीप सर जी इस हौसलाफजाई के लिए आप सभी का हृदय से धन्यवाद
स्नेह यूँ ही बनाए रखिए

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on May 15, 2013 at 1:32pm

माँ का दामन है या है मेरा बिछौना मखमली

गोद में जाते ही मीठी झपकियाँ आने लगी

 सस्नेह बधाई 

Comment by ram shiromani pathak on May 15, 2013 at 11:49am

वाह वाह सर जी बहुत सुन्दर ////////////

Comment by shalini kaushik on May 15, 2013 at 1:53am

बहुत सुन्दर 

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