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प्रतिभा छुपी हुई है सबमें,करो उजागर,
अथाह ज्ञान,गुण, शौर्य समाहित,तुम हो सागर।
डरकर,छुपकर,बन संकोची,रहते क्यूँ हो?
मन पर निर्बलता की चोटें,सहते क्यूँ हो?

तिमिर चीर रवि द्योत धरा पर ले आता है।
अंधकार से डरकर क्यूँ नहीं छिप जाता है?
पराक्रमी राहों को सुलभ सदा कर देते,
आलस प्रिय जिनको,बहाने बना ही लेते।

तंत्र,मन्त्र,ज्योतिष विद्या,कर्मठ के संगी,
भाग्य भरोसे जो बैठे वो सहते तंगी।
प्रबल भुजाओं को खोलो,प्रशंस्य बनो,
राष्ट्रप्रेम हित योगदान का तुम भी अंश बनो।

निश्शंक होय बढ़ते जो,मंजिल पाते हैं।
बल-बूते पर अपने वो अव्वल आते हैं।
परिचय श्रेष्ठ बनाना हो तो,आगे आओ,
वरना दूजों के बस सम्बन्धी कहलाओ।



मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 2, 2021 at 4:32pm

आ. सुचिसंदीप जी, अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई।

Comment by शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप" on April 29, 2021 at 1:52pm

उत्साहवर्धन हेतु हार्दिक आभार बासुदेव भैया।

Comment by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on April 29, 2021 at 10:12am

शुचि बहन बहुत ही सुंदर आत्म बल जगाती हुई कविता की बधाई।

Comment by शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप" on April 28, 2021 at 12:51pm
आदरणीय भाई आजी तमाम जी, प्रोत्साहन हेतु हार्दिक आभार व्यक्त करती हूँ।
Comment by Aazi Tamaam on April 28, 2021 at 11:59am

सादर प्रणाम आ सुचसंदीप जी बेहद उत्तम रचना है

बधाई स्वीकारें

सादर

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