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Aazi Tamaam
  • Male
  • Bareilly, UP
  • India
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Jul 8
Aazi Tamaam commented on Aazi Tamaam's blog post ग़ज़ल: सुरूर है या शबाब है ये
"प्रणाम आ गुरु जी ग़ज़ल तक आने व बारीकी से इस्लाह देने और मार्गदर्शन करने के लिए मैं तहे दिल से आपका आभार व्यक्त करता हूँ जी गुरु जी मैं अब ज्यादा वक़्त पढ़ाई को ही देता हूँ पर कभी कभी मन नहीं मानता तो मन को शांत करने के लिए मजबूरीबस कुछ लिखने का…"
Jun 7
Samar kabeer commented on Aazi Tamaam's blog post ग़ज़ल: सुरूर है या शबाब है ये
"जनाब आज़ी तमाम जी आदाब, इस बह्र पर ग़ज़ल कहना आसान नहीं है, फिर भी पने प्रयास किया इसके लिये बधाई I  फ़क़ीर की है या पीर की है के चश्म जो आब-ओ-ताब है ये-- इस शे`र के दोनों मिसरों में रब्त नहीं है ,और सानी का वाक्य विन्यास भी दुरुस्त नहीं…"
Jun 7
Aazi Tamaam commented on Aazi Tamaam's blog post ग़ज़ल: सुरूर है या शबाब है ये
"हौसला अफ़ज़ाई के लिए आ धामी सर का हृदय से स्वागत है सादर"
Jun 1
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Aazi Tamaam's blog post ग़ज़ल: सुरूर है या शबाब है ये
"आ. भाई आजी तमाम जी, सादर अभिवादन। बहुत सुन्दर गजल हुई है। हार्दिक बधाई।"
May 31
Aazi Tamaam commented on Aazi Tamaam's blog post ग़ज़ल: सुरूर है या शबाब है ये
"आ सूबे जी ग़ज़ल तक आने व हौसला अफ़ज़ाई के लिए दिल से शुक्रिया"
May 27
Aazi Tamaam commented on Aazi Tamaam's blog post ग़ज़ल: सुरूर है या शबाब है ये
" आ gumnaam ji हौसला अफ़ज़ाई व ग़ज़ल तक आने के लिए सहृदय शुक्रिया सादर "
May 27
सूबे सिंह सुजान commented on Aazi Tamaam's blog post ग़ज़ल: सुरूर है या शबाब है ये
"अरे वाह वाह वाह बहुत खूब लिखा है"
May 27
gumnaam pithoragarhi commented on Aazi Tamaam's blog post ग़ज़ल: सुरूर है या शबाब है ये
"वाह बहुत खूब गजल हुई है । बधाई .. "
May 25
Aazi Tamaam commented on Aazi Tamaam's blog post ग़ज़ल: सुरूर है या शबाब है ये
" सहृदय शुक्रिया आ अरुण जी ग़ज़ल तक आने व हौसला अफ़ज़ाई करने के लिए सादर"
May 24
DR ARUN KUMAR SHASTRI commented on Aazi Tamaam's blog post ग़ज़ल: सुरूर है या शबाब है ये
" Aazi Tamaam सहिब कमाल की गजल पेश करी वाह वाह आपका इकबाल बुलन्द रहे जनाब मुझे बेहद पसंद आई "
May 23
Aazi Tamaam posted a blog post

ग़ज़ल: सुरूर है या शबाब है ये

12112 12112सुरूर है या शबाब है येके जो भी है ला जवाब है येफ़क़ीर की है या पीर की हैके चश्म जो आब-ओ-ताब है येकज़ा है अगर सरक गया तोजो चेहरे पे नकाब है येअजीब है सफ़ह-ए-ज़िंदगी भीन पूछो की क्या जनाब है येकभी है ख़ुशी तो है कभी ग़मबस एक ऐसी किताब है येहैं अश्क से आज चश्म जो नममहब्बतों का हिसाब है येन जाने कोई है माज़रा क्याकी ज़िंदगी है या ख़्वाब है येवो आये और आ के चल दिये हैंहै रुख़्सती या अज़ाब है येकटार हैं आँखें नर्म हैं लबके हुस्न है या गुलाब है येन होश में हैं न होश है गुमन जाने कैसी शराब…See More
May 22
Aazi Tamaam commented on Samar kabeer's blog post ओबीओ की बारहवीं सालगिरह का तुहफ़ा
"वाह वाह आ गुरू जी बेहद सुन्दर रचना ओ बी ओ के लिए नायाब तुह्फ़ा बधाई स्वीकार करें आदरणीय"
Apr 12
Aazi Tamaam posted a photo
Mar 16
Aazi Tamaam commented on Aazi Tamaam's blog post ग़ज़ल: इक ऐसे ग़म से आज मुलाक़ात हो गई
"सहृदय शुक्रिया आ हौसला अफ़ज़ाई का सादर"
Mar 5
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Aazi Tamaam's blog post ग़ज़ल: इक ऐसे ग़म से आज मुलाक़ात हो गई
"आ. भाई आजी तमाम जी , तरही मिसरे की जमीन पर गजल का अच्छा प्रयास हुआ है । हार्दिक बधाई।"
Mar 3

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Male
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Uttar Pradesh
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CHANDAUSI
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Poet, Lawer, Engineer
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ग़ज़ल: सुरूर है या शबाब है ये

12112 12112

सुरूर है या शबाब है ये

के जो भी है ला जवाब है ये

फ़क़ीर की है या पीर की है

के चश्म जो आब-ओ-ताब है ये

कज़ा है अगर सरक गया तो

जो चेहरे पे नकाब है ये

अजीब है सफ़ह-ए-ज़िंदगी भी

न पूछो की क्या जनाब है ये

कभी है ख़ुशी तो है कभी ग़म

बस एक ऐसी किताब है ये

हैं अश्क से आज चश्म जो नम

महब्बतों का हिसाब है ये

न जाने कोई है माज़रा क्या

की…

Continue

Posted on May 22, 2022 at 8:00am — 10 Comments

ग़ज़ल: इक ऐसे ग़म से आज मुलाक़ात हो गई

२२१ २१२१ १२२१ २१२

पाकर जिसे हयात हवालात हो गई

इक ऐसे ग़म से आज मुलाक़ात हो गई

कैसे बताएँ आपके बिन कुछ नहीं हैं हम

कैसे बताएँ आपको क्या बात हो गई

अंजान थी जो आँख मिरी जान अश्क़ से

बाद आपके यूँ रोई की बरसात हो गई

इक पल में खुशनुमा हुई इक पल में रहनुमा

फ़िर एक पल में दर्द की सौग़ात हो गई

कैसी है दास्ताँ ये मिरी जान ज़िंदगी

रौशन हुई कहीं तो कहीं रात हो गई

मौलिक व…

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Posted on February 26, 2022 at 11:30pm — 2 Comments

ग़ज़ल: हर इक दिन इन फ़ज़ाओं में नई अल्बम लगाता है

1222 1222 1222 1222

हर इक दिन इन फ़ज़ाओं में नई अल्बम लगाता है

कोई तो है हरी सी घास पर शबनम लगाता है

कहीं सुनता नहीं महफ़िल में भी अब दर्द ए दिल कोई

किसे आवाज वीराने में तू हमदम लगाता है

अज़ब है वाक़िया या रब अज़ब साकी मिला दिल को

नमक ज़ख़्मों पे दिल के किस क़दर पैहम लगाता है

धुआँ होकर निकलती हैं ये साँसें दिल के अंदर से

किसी की याद में दिल दम व दम फिर दम लगाता…

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Posted on January 15, 2022 at 3:00pm

ग़ज़ल: आख़िरश वो जिसकी खातिर सर गया

2122 2122 212

आख़िरश वो जिसकी ख़ातिर सर गया

इश्क़ था सो बे वफ़ाई कर गया

आरज़ू-ए-इश्क़ दिल में रह गई

जुस्तजू-ए-इश्क़ से दिल भर गया

दिल की दुनिया दर्द का बाजार है

दर-ब-दर…

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Posted on January 13, 2022 at 12:30pm — 6 Comments

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At 1:08pm on January 16, 2021, लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' said…

आ. भाई आज़ी तमाम जी, सादर अभिवादन । मेरी गजलें आपको अच्छी लगीं यह हर्ष का विषय है । आपके इस स्नेह के लिए हार्दिक धन्यवाद।

मंच पर अपनी रचनाओं का आनन्द लेने का अवसर प्रदान करें और अन्य रचनाकारों का भी अपनी प्रतिक्रिया से उत्साहवर्धन करते रहिए ।

At 8:15pm on January 12, 2021, Samar kabeer said…

जनाब आज़ी साहिब,तरही मुशाइर: में शामिल सभी ग़ज़लों पर लाइव ही तफ़सील से गुफ़्तगू होती है, शिर्कत फ़रमाएँ, और कोई उलझन हो तो मुझसे 09753845522 पर बात कर सकते हैं ।

 
 
 

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"क्या खूब कहा है आपने बधाईयां।।"
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"सुन्दर सृजन। हार्दिक शुभकामनायें।"
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