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Aazi Tamaam
  • Male
  • Bareilly, UP
  • India
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Aazi Tamaam commented on Aazi Tamaam's blog post ग़ज़ल: ज़ुमुररुद कब किसी मुफ़्लिस के घर चूल्हा जलाता है
"सादर प्रणाम आ ब्रजेश जी सहृदय शुक्रिया हौसला अफ़ज़ाई का"
Jul 13
Aazi Tamaam posted a blog post

ग़ज़ल: ज़ुमुररुद कब किसी मुफ़्लिस के घर चूल्हा जलाता है

1222 1222 1222 1222ज़ुमुररुद कब किसी मुफ़्लिस के घर चूल्हा जलाता हैमिरी जाँ ये तो बस शाहों कि पोशाकें सजाता हैरिआया भी तो देखो कितनी दीवानी सी लगती हैउसी को ताज़ कहती है जो इनके घर जलाता हैनगर में नफ़रतों के भी महब्बत कौन समझेगाए पागल दिल तू वीराने में क्यों बाजा बजाता हैहमारे हौसले तो कब के आज़ी टूट जाते परये नन्हा सा परिंदा है जो आशाएँ जगाता हैकोई बेचे यहाँ आँसू तो कोई ज़िस्म बेचे हैखुदाया पेट भी इंसान से क्या क्या कराता हैगज़ब का इश्क़ है आज़ी ख़ुदा का ख़ुद के बंदो सेकभी दिल तोड़ देता है कभी…See More
Jul 6
Aazi Tamaam commented on अमीरुद्दीन 'अमीर''s blog post ग़ज़ल (जगह दिल में तुम्हारे...)
"सादर प्रणाम आ अमीर जी बेहद खूबसूरत ग़ज़ल हुई है सादर"
Jul 6
Aazi Tamaam commented on Manoj kumar Ahsaas's blog post अहसास की ग़ज़ल : मनोज अहसास
"सादर प्रणाम आ ब्रजेश जी बेहद खूबसूरत कोशिश है आपकी भी गुरु जी का मशविरा तो सर आँखों पर सादर"
Jul 6
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Aazi Tamaam's blog post ग़ज़ल: ज़ुमुररुद कब किसी मुफ़्लिस के घर चूल्हा जलाता है
"आपके प्रयास बड़े अच्छे लगते है भाई आज़ी...बाकी गुरुजनों की नजर है तो सब है।"
Jul 4
Aazi Tamaam commented on Aazi Tamaam's blog post ग़ज़ल: ज़ुमुररुद कब किसी मुफ़्लिस के घर चूल्हा जलाता है
"सादर प्रणाम आ धामी सर हौसला अफ़ज़ाई के लिये सहृदय शुक्रिया जी धामी सर गुणीजनों के मार्गदर्शन में ग़ज़ल मुकम्मल हुई है गुणीजनों को दिल से धन्यवाद"
Jul 1
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Aazi Tamaam's blog post ग़ज़ल: ज़ुमुररुद कब किसी मुफ़्लिस के घर चूल्हा जलाता है
"आ. भाई आज़ी तमाम जी, गजल का प्रयास अच्छा है । हार्दिक बधाई । शेष सुधीजन कह चुके हैं । सादर.."
Jul 1
Aazi Tamaam posted a blog post

ग़ज़ल: ज़ुमुररुद कब किसी मुफ़्लिस के घर चूल्हा जलाता है

1222 1222 1222 1222ज़ुमुररुद कब किसी मुफ़्लिस के घर चूल्हा जलाता हैमिरी जाँ ये तो बस शाहों कि पोशाकें सजाता हैरिआया भी तो देखो कितनी दीवानी सी लगती हैउसी को ताज़ कहती है जो इनके घर जलाता हैनगर में नफ़रतों के भी महब्बत कौन समझेगाए पागल दिल तू वीराने में क्यों बाजा बजाता हैहमारे हौसले तो कब के आज़ी टूट जाते परये नन्हा सा परिंदा है जो आशाएँ जगाता हैकोई बेचे यहाँ आँसू तो कोई ज़िस्म बेचे हैखुदाया पेट भी इंसान से क्या क्या कराता हैगज़ब का इश्क़ है आज़ी ख़ुदा का ख़ुद के बंदो सेकभी दिल तोड़ देता है कभी…See More
Jun 29
Aazi Tamaam commented on अमीरुद्दीन 'अमीर''s blog post कोविड 19 - 2021
"सादर प्रणाम आ अमीर जी मुझे ये बात बेहद पसंद आई जिस दौर में ज्यादातर लोग सरकार के पिछ लग्गू बने घूम रहे हैं सरकार की आलोचना देश आलोचना का विषय बन चुका है वहाँ आप सच लिख कर सच्चे कलाम की मिशाल पेश कर रहे हैं ये वाकई काबिल ए तारीफ है इसके लिये अलग से…"
Jun 29
Aazi Tamaam commented on Aazi Tamaam's blog post ग़ज़ल: ज़मुर्रद कब किसी मुफ़्लिस के घर चूल्हा जलाता है
"सादर प्रणाम आ अमीर जी ग़ज़ल तक आने व मार्गदर्शन करने के लिये सहृदय शुक्रिया जी बदलने का प्रयास करता हूँ मिसरे सादर"
Jun 29
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on Aazi Tamaam's blog post ग़ज़ल: ज़मुर्रद कब किसी मुफ़्लिस के घर चूल्हा जलाता है
"जनाब आज़ी तमाम साहिब आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है बधाई स्वीकार करें। ज़ुमुररुद को टाईटल में भी ठीक कर लें। 'तिलिस्मी रत्न बस शाहों कि पोशाकें सजाता है'   इस मिसरे में रत्न के साथ तिलिस्मी शब्द (जादुई) का गठजोड़ उचित नहीं है…"
Jun 28
Aazi Tamaam posted a blog post

ग़ज़ल: ज़ुमुररुद कब किसी मुफ़्लिस के घर चूल्हा जलाता है

1222 1222 1222 1222ज़ुमुररुद कब किसी मुफ़्लिस के घर चूल्हा जलाता हैमिरी जाँ ये तो बस शाहों कि पोशाकें सजाता हैरिआया भी तो देखो कितनी दीवानी सी लगती हैउसी को ताज़ कहती है जो इनके घर जलाता हैनगर में नफ़रतों के भी महब्बत कौन समझेगाए पागल दिल तू वीराने में क्यों बाजा बजाता हैहमारे हौसले तो कब के आज़ी टूट जाते परये नन्हा सा परिंदा है जो आशाएँ जगाता हैकोई बेचे यहाँ आँसू तो कोई ज़िस्म बेचे हैखुदाया पेट भी इंसान से क्या क्या कराता हैगज़ब का इश्क़ है आज़ी ख़ुदा का ख़ुद के बंदो सेकभी दिल तोड़ देता है कभी…See More
Jun 28
Aazi Tamaam commented on Aazi Tamaam's blog post ग़ज़ल: ज़मुर्रद कब किसी मुफ़्लिस के घर चूल्हा जलाता है
"सादर प्रणाम गुरु जी गलतियाँ सुझाने व हौसला अफजाई के लिये सहृदय शुक्रिया ठीक करके फ़िर से पोस्ट करने की कोशिश करता हूँ सादर गुरु जी"
Jun 27
Samar kabeer commented on Aazi Tamaam's blog post ग़ज़ल: ज़मुर्रद कब किसी मुफ़्लिस के घर चूल्हा जलाता है
"जनाब आज़ी तमाम जी आदाब, ग़ज़ल अभी समय चाहती है,बहरहाल इस प्रयास पर बधाई स्वीकार करें । 'ज़मुर्रद कब किसी मुफ़्लिस के घर चूल्हा जलाता है' इस मिसरे में सहीह शब्द है "ज़ुमुररुद" 'जम्हूरियत भी तो देखो कितनी दीवानी सी लगती…"
Jun 27
Aazi Tamaam posted blog posts
Jun 27
Aazi Tamaam replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-132
"शुक्रिया आ सादर"
Jun 26

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CHANDAUSI
Profession
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ग़ज़ल: ज़ुमुररुद कब किसी मुफ़्लिस के घर चूल्हा जलाता है

1222 1222 1222 1222

ज़ुमुररुद कब किसी मुफ़्लिस के घर चूल्हा जलाता है

मिरी जाँ ये तो बस शाहों कि पोशाकें सजाता है

रिआया भी तो देखो कितनी दीवानी सी लगती है

उसी को ताज़ कहती है जो इनके घर जलाता है

नगर में नफ़रतों के भी महब्बत कौन समझेगा

ए पागल दिल तू वीराने में क्यों बाजा बजाता है

हमारे हौसले तो कब के आज़ी टूट जाते पर

ये नन्हा सा परिंदा है जो आशाएँ जगाता है

कोई बेचे यहाँ आँसू तो कोई…

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Posted on June 24, 2021 at 6:00pm — 8 Comments

ग़ज़ल: उठाकर शहंशाह क़लम बोलता है

122 122 122 122

उठाकर शहंशह क़लम बोलता है

चढ़ा दो जो सूली पे ग़म बोलता है

ये फरियाद लेकर चला आया है जो

ये काफ़िर बहुत दम ब दम बोलता है

जुबाँ काट दो उसकी हद को बता दो

बड़ा कर जो कद को ख़दम बोलता है

गँवारों की वस्ती है कहता है ज़ालिम

किसे नीच ढा कर सितम बोलता है

बिठाता है सर पर उठाकर उसी को

जो कर दो हर इक सर क़लम बोलता है

बड़ी बेबसी में है जीता वो ख़ादिम

बड़ाकर जो…

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Posted on June 15, 2021 at 4:30pm — 6 Comments

नग़मा: दिल

1222 1222 1222 1222

अज़ीब इस दिल की बातें हैं अज़ीब इसके तराने हैं

अज़ीब ही दर्द है इसका अज़ीब ही दास्तानें हैं

अज़ीब अंज़ाम है इसका अज़ीब आग़ाज़ करता है

अगर जो टूट भी जाये तो ना आवाज़ करता है

कभी सुरख़ाब करता है कभी बेताब करता है

दिल ए नादाँ............. दिल ए नादाँ...........

दिल ए नादाँ हर इक ख़्वाहिश को ही आदाब करता है

ये करतब कितनी आसानी से यारो दिल ये करता है

कभी ये ज़ख़्म देता है,…

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Posted on June 10, 2021 at 10:23am — 2 Comments

ग़ज़ल: लाओ जंजीर मुझे पहना दो

2122 1122 22

लाओ जंजीर मुझे पहना दो 

मेरी तकदीर मुझे पहना दो

तुम ख़ुदा हो तो ये डर कैसा है

मेरी तहरीर मुझे पहना दो

जो भी चाहो वो सज़ा दो मुझको

जुर्म ए तामीर मुझे पहना दो

पहले काटो ये ज़ुबाँ मेरी फिर

कोई तज़्वीर मुझे पहना दो

मुफ़्लिसी ज़ुर्म अगर है मेरा

सारी ताजी़र मुझे पहना दो

आज आया हूँ मैं हक की खातिर

कोई तस्वीर मुझे पहना दो

मौलिक व…

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Posted on June 2, 2021 at 12:30pm — 9 Comments

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At 1:08pm on January 16, 2021, लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' said…

आ. भाई आज़ी तमाम जी, सादर अभिवादन । मेरी गजलें आपको अच्छी लगीं यह हर्ष का विषय है । आपके इस स्नेह के लिए हार्दिक धन्यवाद।

मंच पर अपनी रचनाओं का आनन्द लेने का अवसर प्रदान करें और अन्य रचनाकारों का भी अपनी प्रतिक्रिया से उत्साहवर्धन करते रहिए ।

At 8:15pm on January 12, 2021, Samar kabeer said…

जनाब आज़ी साहिब,तरही मुशाइर: में शामिल सभी ग़ज़लों पर लाइव ही तफ़सील से गुफ़्तगू होती है, शिर्कत फ़रमाएँ, और कोई उलझन हो तो मुझसे 09753845522 पर बात कर सकते हैं ।

 
 
 

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