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Rahul Dangi Panchal's Blog (39)

ग़ज़ल-बेहयाई दफ़्न कर देगी किसी की शायरी।

2122 2122 2122 212



काँच के टुकडों में दे दे ज्यों कोई बच्चा मणी

आधुनिकता में कहीं खोया तो है कुछ कीमती।

हुस्न की हर सू नुमाइश़ चल रही है जिस तरह

बेहयाई दफ़्न कर देगी किसी की शायरी।

ताश, कन्चें, गुड्डा, गुड़िया छीन के घर मिट्टी के

लाद दी हैं मासुमों पर रद्दियों की टोकरी।

अब कहाँ हैं गाँव में वें पेड़ मीठे आम के

वे बया के घोसलें, वे जुगनुओं की रौशनी।

ले गयी सारी हया पश्चिम से आती ये हवा…

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Added by Rahul Dangi Panchal on December 17, 2018 at 9:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल -प्यार के बिन प्यार अपने आप घटता सा गया।

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रोज के झगड़े, कलह से दिल अब उकता सा गया।

प्यार के बिन प्यार अपने आप घटता सा गया।



दफ़्न कर दी हर तमन्ना, हर दफ़ा,जब भी उठी

बारहा इस हादसे में रब्त पिसता सा गया।



रोज ही झगड़े किये, रोज ही तौब़ा किया

रफ़्ता रफ़्ता हमसे वो ऐसे बिछड़ता सा गया।

चाहकर भी कुछ न कर पाये अना के सामने

हाथ से दोनों ही के रिश्ता फिसलता सा गया।



छोडकर टेशन सनम को लब तो मुस्काते रहें

प्यार का मारा हमारा दिल तड़पता…

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Added by Rahul Dangi Panchal on December 16, 2018 at 8:30pm — 4 Comments

ग़ज़ल-खुदकुशी बेहतर है ऐ दिल बेवफ़ा के साथ से

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खुदकुशी बेहतर है ऐ दिल बेवफ़ा के साथ से

चाहो मत बढकर किसी को चाह की औकात से।

जिसकी ख़ातिर छोड़ दी दुनिया की सारी दौलतें

रख न पाया मन भी मेरा वो दो मीठी बात से ।

दे रहा है तुहमतें उल्टा मुझे ही बेवफ़ा 

बेहया से क्या कहूँ मैं, क्या कहूँ इस जात से।

मैं समझता था मुहब्बत की सभी को हैं तलब

उसको तो मतलब है लेकिन और कोई बात से।

हैं मुसलसल शिद्दतें कुछ यूँ जुदाई की…

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Added by Rahul Dangi Panchal on December 1, 2018 at 3:30pm — 6 Comments

ग़ज़ल- बूँद भर जल के लिए लिपटा हूँ काँटों की कली से।

2122 2122 2122 2122


इस कदर बेबस हूँ मैं, लाचार हूँ इस ज़िन्दगी से
दोस्तों, मर भी नहीं सकता अभी, अपनी खुशी से।

क्या कहूँ, अपने लिए कुछ, दूसरों के वास्ते कुछ
कायदे तुमने लिखे है सोच बेहद दोगली से।

वक्त उन माँ-बाप को भी दे जरा, तेरे लिए
जो उभर पाये नहीं ताउम्र अपनी मुफ़लिसी से।

इश्क़ के सहरा में 'राहुल' प्यास से बदहाल यूँ हूँ
बूँद भर जल के लिए लिपटा हूँ काँटों की कली से।

मौलिक व अप्रकाशित ।

Added by Rahul Dangi Panchal on November 25, 2018 at 12:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल- दर्द की क्या कहूँ ये धडकन है

२१२२ १२१२ २२
दर्द की क्या कहूँ ये धडकन है।
दिल में घर है जिगर में आँगन है।

तुम न समझो तो क्या करे कोई।
मेरे मन में तुम्हारी उलझन है।

तुम जमाने की सुन के मत रूठो।
ये जमाना तो सिर्फ दुश्मन है।

क्या अजब रोग है मुहब्बत भी।
दिल की राहत ही दिल की तडपन है।

इसमें उसकी खता नहीं ' राहुल' ।
मेरी किस्मत की मुझसे अनबन है।

मौलिक व अप्रकाशित ।

Added by Rahul Dangi Panchal on June 12, 2016 at 9:07am — 2 Comments

ग़ज़ल- काम आईँ नही दवाएँ क्यूँ

2122 1212 22



बेअसर हो गईं दवाएँ क्यूँ

काम आईं नहीं दुआएँ क्यूँ



हम ग़लत फ़हमियों में आएँ क्यूँ

दोस्त है वो तो आज़माएँ क्यूँ



आँख तक आँसुओं को लाएँ क्यूँ

ज़ब्त की एहमियत गिराएँ क्यूँ



साँस दर साँस एक ही सरगम

दूसरा गीत गुनगुनाएँ क्यूँ



जिसके सीने में दिल हो पत्थर का

उसकी चौखट पे गिडगिडाएँ क्यूँ



वक्त आने पे जान जाएगा

इश्क़ क्या है उसे बताएँ क्यूँ



हो गईं क्या समाअतें कमज़ोर

कोई सुनता नहीं सदाएँ…

Continue

Added by Rahul Dangi Panchal on May 16, 2016 at 12:00am — 12 Comments

ग़ज़ल--क्यूं कभी मेरी किसी से या खुदा बनती नहीं।

२१२२ २१२२ २१२२ २१२



क्यूं कभी मेरी किसी से या खुदा बनती नहीं।

आपने मेरे लिए कोई खुशी सोची नहीं ।



लोग जो अच्छे है मुझको सोच लेते हैं बुरा।

क्या मेरी नादानियों की आदतें अच्छी नहीं ।



मैंने उनसे सिर्फ अपनी भावनाएँ बाँटी थी।

बेवजह गुस्सा ये उनका क्या गलतफहमी नहीं।



मान ली मैंने चलो मुझसे खता कुछ हो गयी।

हो गयी अनजाने में अब क्या मुझे माफी नहीं।



सीख में आकर जमाने की किया है फैसला।

बात की दहलीज तक तो आप पहुँचे भी… Continue

Added by Rahul Dangi Panchal on March 18, 2016 at 8:10am — 3 Comments

ग़ज़ल-आह उफ कर ले रू ब रू न आए।

२१२२ १२१२ २२

क्यूं मुझे मौत की ये बू न आये।
तेरी याद आए और तू न आये।

जख्म दर जख्म चींख,दर्द,आह,उफ।
हाल-ए-दिल,शे'र हू-ब-हू न आये।

रोज देखे किसी को छुप के हम।
आह उफ कर ले रू ब रू न आए।

रोज आए नजर से लब तक हम।
पर लबों तक ये आरजू न आये।

वो ग़ज़ल क्या ग़ज़ल जिसे सुनकर।
दर्द की आँख में लहू न आये।

होंठ पर फूल और दिल काला।
मुझको ये इल्मे गुफ्तगू न आये।

मौलिक व अप्रकाशित ।

Added by Rahul Dangi Panchal on March 13, 2016 at 9:00pm — 14 Comments

गीत- ये है पुलिस की नौकरी,

२२१२ २२१२ २२१२ २२१२



ये है पुलिस की नौकरी, ये है पुलिस की नौकरी ।

कानून की ये टोकरी, ये है पुलिस की नौकरी ।



मुजरिम को पकडे तो कहे कुछ लोग अत्याचार है।

गर चुप रहे तो कहते है करती पुलिस व्यापार है।

जब मस्तियों में गाँव हो या नींद में होता शहर।

ऐ दोस्तो वे हम ही है जो जागते आठों पहर।

सोने का या फिर खाने का यां वक्त कुछ निश्चित नहीं।

हो जुर्म कितना भी मगर हम है तो तुम चिंतित नहीं

फिर भी हमें है लाख तानें और हजारों बात है।

हर फर्ज पूरा कर… Continue

Added by Rahul Dangi Panchal on March 5, 2016 at 2:38pm — 2 Comments

ग़ज़ल-आश फिर भी न बाज आती है।

२१२२ १२१२ २२

वक्त बेवक्त याद आती है।
बेहया रात दिन रुलाती है।

तेरे खत से महक चुराता हूँ।
तब कहीं एक साँस आती है।

रोज किस्मत मेरी मुहब्बत में।
दर पे आ आ के लौट जाती है।

साफ कह बेवफा सनम तू अब।
मेरी गुरबत से हिचकिचाती है।

जिन्दगी कोसती रही दिल को।
आश फिर भी न बाज आती है।

दिल के हर इक गली मुहल्ले में।
रात भर हिज्र खूं बहाती है।

मौलिक व अप्रकाशित ।

Added by Rahul Dangi Panchal on February 29, 2016 at 1:16pm — 8 Comments

ग़ज़ल- वक्त को मौत का इनाम आए।

2122 1212 22

तेरे हक में खुशी तमाम आए।
मेरा हिस्सा भी तेरे नाम आए।

तेरी पलके कभी न हो गीली।
और मुस्कान सुब्हो शाम आए।

बेरहम वक्त ने किया है जो।
वक्त को मौत का इनाम आए।

तुझे लवकुश कि इतनी राहत दे ।
याद तुझको कभी न राम आए।

दिल जिगर रूह राह देखे है।
कौन पहले तुम्हारे काम आए।

अपना मतलब तो सिर्फ इतना है।
तेरे लब पर मेरा कलाम आए।

मौलिक व अप्रकाशित ।

Added by Rahul Dangi Panchal on February 27, 2016 at 3:39pm — 6 Comments

ग़ज़ल-मुझे फिर लगे आज तानों के पत्थर।

१२२ १२२ १२२ १२२



मुझे फिर लगे आज तानों के पत्थर।

कई बद से बदतर जुबानों के पत्थर।



ग़ज़ल के ये लहजे नये है, जवां है।

न समझो इन्हें तुम ढलानों के पत्थर।



जिन्हें कब्र पर शाह की रख गये तुम।

वे पत्थर है मुफलिस मकानों के पत्थर।



खता आज ऐसी हुई है कि मुझको।

लगेंगे हजारों जमानों के पत्थर।



समझता नहीं चाल उसकी कभी वो।

पडे है जहन पर गुमानों के पत्थर।



बहुत दर्द था रात आहों में उनकी।

उठा ले गये वो दुकानों के… Continue

Added by Rahul Dangi Panchal on January 24, 2016 at 10:30pm — 14 Comments

गजल - जिन्दगी का एक पन्ना और गया।

२१२२ २१२२ २१२

जिन्दगी का एक पन्ना और गया।
याद तेरी छोडकर सब ले चला।

कुछ तो गम की बेडियों में कैद था।
कुछ हमेशा वक्त को रोता रहा।

हम रखे बस हर घडी तेरी खबर।
दीन दुनिया से हमें लेना है क्या।

जानकर पहचान कर अनजान है।
बेरहम वो बेहया वो बेवफा।

ख्वाइशें सब दिल की दिल में रह गयी।
इसकदर जालिम का हर इक लफ्ज था।

कुछ बहुत खुश हो के मिलते है हमें।
कुछ हमेशा देते रहते बद्दुआ।

मौलिक व अप्रकाशित ।

Added by Rahul Dangi Panchal on December 31, 2015 at 9:40pm — 5 Comments

ग़ज़ल- बेरहम दुनिया ने मुझसे शायरी भी छीन ली।

2122 2122 2122 212



आखिरी उम्मीद की अब ये कली भी छीन ली।

बेरहम दुनिया ने मुझसे शायरी भी छीन ली।



रौशनी की बात तो किस्मत में लिक्खी ही नहीं ।

छुप के रोया तो खुदा ने तीरगी भी छीन ली।



दिल लगाया था किसी से दिल्लगी के वास्ते।

दिल्लगी क्या कर ली ख्वाबों की हँसी भी छीन ली।



मय न पीने को मिली तो अश्क ही पीने लगा ।

देख यह किस्मत ने आँखों की नमी भी छीन ली।



दोस्ती के फूल जब मुरझा गये इक मोड पर।

मुफलिसी ने फिर कहानी प्यार की भी… Continue

Added by Rahul Dangi Panchal on September 14, 2015 at 2:12pm — 12 Comments

ग़ज़ल- तुम मिले तो धडकनों में फिर रवानी सी लगी।

2122 2122 2122 212



तुम मिले तो धडकनों में फिर रवानी सी लगी।

तुम मिले तो जिन्दगानी जिन्दगानी सी लगी।



तुम मिले तो आज ये दुनिया सुहानी सी लगी।

तुम मिले तो सच मुहब्बत जाविदानी सी लगी।



तुम मिले तो दिल के हर इक मोड पर खुशियाँ सजी।

तुम मिले तो साँस सुख की राजधानी सी लगी।



तुम मिले तो प्यार का हर एक किस्सा दिलरुबा।

मुझको अपनी और तेरी ही कहानी सी लगी।



जब तुम्हें पहली दफा देखा मेरे जज्बात ने।

तुम कोई पिछले जनम की जानी जानी सी… Continue

Added by Rahul Dangi Panchal on September 7, 2015 at 2:30pm — 14 Comments

ग़ज़ल-पता अपना बता दे तू मुझे ऐ आसमाँ वाले।

१२२२ १२२२ १२२२ १२२२

मेरी तकदीर में लिख दे उसे ऐ आसमाँ वाले।

सिवा उसके मुझे कुछ भी न दे ऐ आसमाँ वाले।



मुझे उस शख़्स के दिल में बसा दे सिर्फ चाहे तू।

नसीबों के सभी सुख छीन ले ऐ आसमाँ वाले।



बिना तुझसे मिले समझा नहीं सकता तुझे अब मैं।

पता अपना बता दे तू मुझे ऐ आसमाँ वाले।



मुहब्बत के सफर में अब मुहब्बत के परिन्दें हो।

मिटा दे नफरतों के काफिले ऐ आसमाँ वाले।



न बस्ती में न जंगल में न सहरा में न उपवन में।

ये दिल मेरा न सावन में… Continue

Added by Rahul Dangi Panchal on August 31, 2015 at 3:16pm — 8 Comments

ग़ज़ल-इन्हीं दो घरों की जवानी रही।

१२२ १२२ १२२ १२

तमाम उम्र जैसे दिवानी रही।
परेशान सी जिन्दगानी रही।।

ये' किस्मत है' मेरी मिलो इससे' तुम।
ये' गम की सदा राजधानी रही।।

कभी बेबसी तो कभी बेकली।
इन्हीं दो घरों की जवानी रही।।

गिरा फिर उठा फिर सदा गिर गया।
दुखी जिन्दगी की कहानी रही।।

सभी दासियाँ थी जिगर में सनम।
फकत आपकी याद रानी रही।।

ये' माना कि 'राहुल' अभी कुछ नहीं ।
मगर बात उसकी सयानी रही।।

मौलिक व अप्रकाशित ।

Added by Rahul Dangi Panchal on August 1, 2015 at 6:00pm — 9 Comments

सरसी मिलिन्दपाद छन्द (ओबीओ मंच को समर्पित)

सरसी मिलिन्दपाद छन्द ।
१६,११ पदान्त में (२१ गुरु,लघु)अनिवार्य
आज गुरुपूर्णिमा पर आदरणीय ओबीओ मंच को समर्पित ।
.
हे जीवन पथ के निर्माता,तुम पे है अभिमान।
तुम ही मात-पिता हो मेरे,तुम ही हो भगवान।
तुम ने दीप ज्ञान का देकर,किया बडा आभार ।
जन्मों जनम तक भी न उतरे,तेरा ये उपकार।
ब्रह्मा,विष्णु,महेश,मुरारी,गुरु चरणों में राम।
तन,मन,धन,सब कुछ अर्पण कर,करूं गुरुवर प्रणाम ।

मौलिक व अप्रकाशित ।

Added by Rahul Dangi Panchal on July 31, 2015 at 10:30pm — 8 Comments

ग़ज़ल- काश अपना भी घौंसला होता।

२१२२ १२१२ २२



काश अपना भी' घौंसला होता।

मैं किसी घर का' लाडला होता।



माँ पिता जी की' गोद में मैं भी।

खेलता कूदता पला होता।



वासना को कहें मुहब्बत सब।

अब नहीं इश्क बावला होता।



शक्ल से तो बडा भला है वो।

काश दिल से जरा भला होता।



उम्र तन्हाँ न यूँ गुजरती गर।

इक कदम का भी' हौसला होता।



मैं न कहता कभी खुदा से दोस्त।

आज इंसाफ अगर चला होता।



शुक्र है वो यहाँ नहीं वरना।

जलजला और जलजला… Continue

Added by Rahul Dangi Panchal on July 26, 2015 at 9:30pm — 12 Comments

ग़ज़ल- कर्म की योग्यता नहीं देतें।

२१२२ १२१२ २२

आजकल सभ्यता नहीं देतें।

बाप भी शिष्टता नहीं देतें।



पेड,पौधें,नदी,जलाशय अब।

स्वर्ग का रास्ता नहीं देतें।



चार पन्नें किताब के मित्रों।

कर्म की योग्यता नहीं देतें।



क्या करूं इस समाज में जी कर।

लोग गर साम्यता नहीं देतें।



तब तलक चुप नहीं रहेंगे हम।

जब तलक सच जता नहीं देतें।



खोल बैठें दुकान अध्यापक।

दाम बिन शिष्यता नहीं देतें।



बात क्या है?जहान को रब जो।

आप अपना पता नहीं… Continue

Added by Rahul Dangi Panchal on July 25, 2015 at 4:00pm — 7 Comments

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