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ग़ज़ल-इन्हीं दो घरों की जवानी रही।

१२२ १२२ १२२ १२

तमाम उम्र जैसे दिवानी रही।
परेशान सी जिन्दगानी रही।।

ये' किस्मत है' मेरी मिलो इससे' तुम।
ये' गम की सदा राजधानी रही।।

कभी बेबसी तो कभी बेकली।
इन्हीं दो घरों की जवानी रही।।

गिरा फिर उठा फिर सदा गिर गया।
दुखी जिन्दगी की कहानी रही।।

सभी दासियाँ थी जिगर में सनम।
फकत आपकी याद रानी रही।।

ये' माना कि 'राहुल' अभी कुछ नहीं ।
मगर बात उसकी सयानी रही।।

मौलिक व अप्रकाशित ।

Views: 598

Comment

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Comment by Rahul Dangi Panchal on August 4, 2015 at 10:12am
आदरणीय गोपाल जी बहुत बहुत आभार
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 4, 2015 at 9:56am

दांगी जी 

बहुत बेहतरीन .

Comment by Rahul Dangi Panchal on August 3, 2015 at 2:30pm
आदरणीय रवि जी बहुत बहुत आभार रचना सफल हुई ।
आपके सुझाव ले पहले मैंने में ही किया था पर किसी कहावत के आधार पर बदल कर की कर दिया था।
सादर नमन
Comment by Rahul Dangi Panchal on August 3, 2015 at 2:29pm
आदरणीय धर्मेन्द्र भाई जी आपकी बात ने बहुत हौसला दिया है शुक्रिया

आदरणीय मेरी विनती है तमाम मंच से क्रपया शब्द चयन व कहन पर भी टिप्पणी किया करें जिससे हम नौसिखियाओं को कुछ और सहारा मिले।
सादर
Comment by Ravi Shukla on August 3, 2015 at 12:07pm

आरणीय राहुल जी

बधाई

कभी बेबसी तो कभी बेकली।
इन्हीं दो घरों की जवानी रही।।  इन्‍हीं दो  घरों में जवानी रही   ......यदि कहें तो रहने का भाव कुछ मुखर हो सकता है  गुणी जन कृपया हमें दिशा दें ।

सभी दासियाँ थी जिगर में सनम।
फकत आपकी याद रानी रही।।

इन दोनेा अशआर की सादगी बहुत पसंद आई

दाद कुबूल करें

आभार

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on August 3, 2015 at 11:42am
और जिस भी शब्द / शब्द समूह के साथ आप सहज महसूस करते हों उसका प्रयोग करें। किसी पूर्वाग्रही व्यक्ति की बातों में आकर अपना ‘स्टाइल’मत गँवायें।
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on August 3, 2015 at 11:35am
अच्छे अश’आर हुए हैं आदरणीय राहुल जी, दाद कुबूल करें
Comment by Rahul Dangi Panchal on August 2, 2015 at 11:06pm
आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी बहुत बहुत आभार ।
आदरणीय मिथिलेश जी व आदरणीय मंच से निवेदन करता हूँ मेरी एक समस्या दूर करें ।
मैं एक गोष्ठी में गया वहाँ पर मुझे उर्दू के हिन्दी शब्द इस्तेमाल करना मना किया गया जैसे इस गजल में " दासियाँ " शब्द। और तमाम उम्र को ता उम्र करने को कहा । क्रपया मार्ग दर्शन करें।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on August 2, 2015 at 7:41pm

आदरणीय राहुल जी, बढ़िया ग़ज़ल हुई है, शेर दर शेर दाद कुबूल फरमाएं.

कृपया ध्यान दे...

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