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रात गहरी, घोर तम छाया हुआ !

हार कर बैठा हूँ --- पथराया हुआ !

यूँ पड़ा हूँ, लोकपथ के तीर पर 

जैसे प्रस्तर-खण्ड ठुकराया हुआ !

दूर जुगनूँ एक दिपता आस का 

शेष सब  सुनसान,   थर्राया हुआ !

टूट बिखरा प्रीत का तारा चमक 

मन सिसकता और पछताया हुआ !

छलछलायी आंख, आंसू बह चले 

प्राण ! आँखों-तट तलक आया हुआ !!

मौलिक/अप्रकाशित 

                           --- नंदकिशोर दुबे  

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 20, 2018 at 11:09pm

आ. भाई नन्द किशोर जी, सुंदर गीतिका हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 18, 2018 at 11:04pm

क्या कहने आदरणीय दुबे जी ..बहुत ही सुन्दर गीतिका कही..

Comment by Mohammed Arif on February 18, 2018 at 7:41am

आदरणीय नंदकीशोर दुबे जी आदाब,

                           बहुत ही सुंदर भावोंं की वाटिका । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on February 17, 2018 at 11:37pm

बहुत सुंदर। हार्दिक बधाई आदरणीय नंदकिशोर दुबे जी।

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