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ज़िन्दगी सपेरे की रहस्यमयी पिटारी हो मानो

नागिन-सी सोच की भटकती हुई गलियों में

हर रिश्ते की कमल-पंखुरी मुरझा कर

सूखकर भी झड़ जाने से पहले लिख जाती है

विचार-भाव में कोई लम्बी भीषण कहानी

अद्भुत है सृष्टि हर रिश्ते की

कभी किसी आकाशीय स्नेह से द्रवित

कभी परिवर्तित हृदय-संबंध से आतंकित

तारिकायों के संग नृत्य में प्र्फुल्लित

या कभी शून्य की सियाह सुरंग से उद्विग्न

पल भर में कहाँ से कहाँ घूम आता है मन

बरसाती रातों में हवा की सांयँ-सांयँ

भरमाया, कुछ घबराया मन मेरा

विचार-मग्न मैं बैठा सोच रहा

कौन है, कोई तो है जो बता आता है पतंगों को

मौसम नहीं है आज आने का, तुम न आना

तुम, न आना ...

अब आयु की भीगी संध्याओं में

स्मृतियों के कुहरे में दबा पराजित-सा

ग़मग़ीन है आज, बहुत उदास है मन

छूट रही है धमनीयों में भी शायद

रफ़तार की खून से पहचान ...

तुम ... न आना

         ---------

-- विजय निकोर

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by vijay nikore on December 30, 2019 at 6:21am

सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार,आदरणीय मित्र, लक्ष्मण जी

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 26, 2019 at 5:43pm

आ. भाई विजय जी, सादर अभिवादन। बहुत सुन्दर रचना हुई है । हार्दिक बधाई।

Comment by vijay nikore on December 26, 2019 at 2:01pm

सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार,आदरणीया मित्र डा० गीता जी।

Comment by Dr. Geeta Chaudhary on December 26, 2019 at 1:49pm

आदरणीय विजय निकोर जी उम्दा रचना के लिए बहुत बधाईI भावों को खुबसूरत शब्द शिल्पकारी से सजाया आपनेI

Comment by vijay nikore on December 25, 2019 at 6:44am

सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार,आदरणीय मित्र सुशील जी।

Comment by Sushil Sarna on December 24, 2019 at 6:45pm

वाह आदरणीय विजय निकोर जी बहुत ही खूबसूरत सृजन हुआ है। अंतर्मन के अंतद्वंद को आपकी कलम ने बहुत ही खूबसूरत अंजाम दिया है। इस बेहतरीन सृजन के लिए दिल से बधाई स्वीकार करें।

Comment by vijay nikore on December 15, 2019 at 7:41pm

सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय भाई समर कबीर जी।

Comment by Samar kabeer on December 13, 2019 at 3:04pm

प्रिय भाई विजय निकोर जी आदाब,बहुत उम्द: रचना हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by vijay nikore on December 4, 2019 at 6:00am

सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय मित्र सुरेन्द्र जी।

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on December 3, 2019 at 7:31pm

आद0 विजय निकोर जी सादर अभिवादन। बेहतरीन रचना पर बधाई स्वीकार कीजिये

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