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ग़ज़ल पास रह गया मेरे है , आपका कलाम भी

*212 1212 1212 1212*

आपकी ही रहमतों से मिल गई वो शाम भी ।
कुछ अदा छलक उठी है कुछ नज़र से जाम भी ।।
---------------------------------------------------------------
ढूढ़िये न आप अब मेरे उसूल का चमन ।
दिल कभी जला यहां तो जल गया मुकाम भी ।।
--------------------------------------------------------------------
नज्र कर दिया गुलाब तो हुई नई ख़ता ।
हुस्न आपका बना गया उसे गुलाम भी ।
------------- -------- ------------------------------- ----
जब चिराग जल गए तो फिर शलभ निकल पड़े ।
कुछ शमा के वास्ते हुए हैं कत्ले आम भी ।।
--------------------------------------------------------------------
मिल गयी नई किरन तो वक्त भी बदल गए ।
मुद्दतों के बाद कर गया कोई सलाम भी ।।
----------------------------------------------------------------------
पूछिये न इश्क में किसे मिला है क्या यहां ।
कुछ फकीर हो गए तो कुछ हुए निजाम भी ।।
-------------------------------------------------------------------------
खो दिया गुरूर जो अना हुई जुदा जहाँ ।
कर सका वही वहाँ खुदा का एहतराम भी ।।
----------------------------------------------------------------------
दो पलों की दूरियां हैं जिंदगी की मौत से ।
कर रहे वो मुद्दतों का खास इंतजाम भी ।।
--------------------------------–-----------------------------------
कुछ निशानियाँ भी छोड़ कर चले गए कहाँ ।
पास रह गया मेरे है आपका कलाम भी ।।

---नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित

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Comment

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Comment by नाथ सोनांचली on January 1, 2018 at 1:52pm

आद0 नवीन जी सादर अभिवादन। बेहतरीन ग़ज़ल कही आपने।शैर दर शैर दाद और मुबारकबाद आपको।

Comment by Naveen Mani Tripathi on October 15, 2017 at 12:34pm
आ0 मो0 आरिफ साहब विशेष आभार । आपके नोट पर अवश्य प्रयास करूंगा ।
Comment by Naveen Mani Tripathi on October 15, 2017 at 12:32pm
आ0 शेख सहज़ाद उष्मानी साहब तहे दिल से शुक्रिया ।
Comment by Naveen Mani Tripathi on October 15, 2017 at 12:30pm
आ0 सालिम रजा रेवा साहब हार्दिक आभार
Comment by SALIM RAZA REWA on October 15, 2017 at 11:40am
आ. -नवीन मणि त्रिपाठी,
ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए बधाई
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 15, 2017 at 9:40am
गुनगुनाने लायक, सुनाने लायक दिलचस्प, भावपूर्ण व विचारोत्तेजक ग़ज़ल के लिए सादर हार्दिक बधाई आदरणीय नवीनमणि त्रिपाठी जी।।
Comment by Mohammed Arif on October 15, 2017 at 7:29am
कुछ निशानियाँ भी छोड़ कर चले गए कहाँ ।
पास रह गया मेरे है आपका कलाम भी ।। बहुत ही उम्दा ग़ज़ल । हर शे'र बढ़िया ।
शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल करें ।
नोट:- कितना अच्छा हो यदि आप जैसे ग़ज़गो साहित्य की अन्य विधाओं पर भी अपनी सृजनशीलता का परिचय देने वालों को भी नहीं पनी टिप्पणियों से पोषित करें ताकि उनका भी उत्साहवर्धन हो सकें ।सादर ।

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