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भीगी सी रुत आई ....//डॉ० प्राची

भीगी सी रुत आई

भीगा सावन भीगी पलकें भीगी सी रुत आई
मन के पन्नों से यादों की मिटती नहीं लिखाई

पहली बारिश में तेरे संग बेसुध हो इतराना
बूँदों के मोती छिटकाना छिटका कर शरमाना
पक्के रस्ते छोड़छाड़ खुद जाना पगडण्डी से
तर हो कर बारिश में छप-छप पानी भी छपकाना

उन भीगी शामों में गर्म चाय की फिर गरमाई
मन के पन्नों से....

रात-रात भर जाग-जाग कर वो मेहंदी रचवाना
हर नन्हें-नन्हें बूटे में तेरा प्यार सजाना
मेहंदी रची हथेली पर सखियों से नज़र बचाकर
चुपके से फिर अक्षर-अक्षर तेरा नाम छिपाना

मेहंदी के सौंधेपन ने फिर साँस-साँस महकाई
मन के पन्नों से....

आँगन में इक बड़े नीम की डाली झुकी-झुकी सी
उसपर झूला साथ झूलकर धड़कन रुकी-रुकी सी
पींग बड़ा कर, कर अठखेली तूने बहुत सताया
थम जाने की मनुहारें कर मैं थक-हार चुकी सी

याद बहुत आती है अब वो मीठी सी रुसवाई
मन के पन्नों से....

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on July 31, 2017 at 8:14pm

सुंदर और सरस गीत के लिए हार्दिक बधाई आ डॉ प्राची जी |

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on July 31, 2017 at 8:11pm
सुन्दर और सरस गीत के लिए हार्दिक बधाई आदरणीया..
Comment by Samar kabeer on July 28, 2017 at 11:09pm
जी,मैं समझ गया,फिर भी फ़ुर्सत मिलते ही इधर झांक लिया करे ।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 28, 2017 at 10:48pm

सावन गीत का यह प्रयास आपको पसंद आया और आपका आशीष मिला , आभारी हूँ आ० समर कबीर जी 

सभी सुझाव ससम्मान स्वीकार्य आदरणीय 

मंच पर सक्रिय न हो पाने का मुझे बहुत खेद है पर नन्हे आद्विक को लेकर निश्चित समय दे सकना संभव नहीं हो पा रहा , साथ ही मेरे लेक्चरस, और फैक्ट्री टेंडर्स उलझाए रखते हैं.... अभी मुझे थोडा समय और लगने वाला है तभी सक्रियता के प्रति आश्वस्त कर सकूंगी .

गीत लिखे बिना रहा नहीं जाता , और जब भी गीत हो तो आदतन सिर्फ अपने ओबीओ पर ही उन्हें पोस्ट करने की निजी प्रतिबद्धता तुरंत यहाँ ले आती है. फिर भी मंच पर यथा संभव सक्रिय बने रहने की कोशिश करूंगी.

सादर 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 28, 2017 at 10:41pm

गीत की सराहना कर मेरा उत्साहवर्धन करने के लिए धन्यवाद आ० रवि शुक्ला जी 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on July 27, 2017 at 4:38pm

आदरणीया प्राची जी हमेशा की तरह शानदार इस गीत पर ढेर सारी बधाई स्वीकार करें ...आदरणीय समर सर के अनुरूप पटल पर मैं आपकी सक्रियता का निवेदन कर रहा हूँ इस मंच पर गीत बिधा पर आपकी सशक्त रचनाओं के रसास्वादन की कामना के साथ ..

Comment by Samar kabeer on July 26, 2017 at 3:35pm
मोहतरमा डॉ.प्राची सिंह साहिबा आदाब,सावन की रुत पर गीत का अच्छा प्रयास हुआ है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
'उन भीगी शामों में गर्म चाय की फिर गरमाई'
ये पंक्ति लय में नहीं है,देखियेगा ।

'रात रात भर जाग जाग कर वो मेहंदी रचवाना'
इस पंक्ति में 'रचवाना'की जगह 'लगवाना'ज़ियादा बहतर होगा,क्योंकि मेंहदी लगवाने के बाद रचती है ।
आख़री बंद की तीसरी पंक्ति में 'पींग बड़ा कर'को "पींग बढ़ा कर"कर लीजियेग ।
अंत में एक बार फिर ये निवेदन करूँगा कि कृपया पटल पर अपनी सक्रियता बनाये रखें ।
Comment by Ravi Shukla on July 26, 2017 at 1:30pm

आदरणीया प्राची जी  बहुत सुन्‍दर गीत लिखा आपने भीगी रुत को साकार करते गीत के लिये हार्दिक बधाई स्‍वीकार करें ।

कृपया ध्यान दे...

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