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सैलाब

मानव-प्रसंगों के गहरे कठिन फ़लसफ़े

अब न कोई सवाल

न जवाब

कहीं कुछ नहीं

"कुछ नहीं" की अजीब

यह मौन मनोदशा

अपार सर दर्द

ठोस, पत्थर के टुकड़े-सा

हृदय-सम्बन्ध सतही न होंगे, सत्य ही होंगे

वरना वीरान अन्तस्तल-गुहा में

दिन-प्रतिदिन पल-पल पल छिन

गहन-गम्भीर घावों से न रिसते रहते

दलदली ज़िन्दगी के अकुलाते

अर्थ अनर्थ

कुछ हुआ कि झपकते ही पलक

विश्व-दृश्य सारा अचानक बदल गया

ज़िन्दगी का घड़ा उस अमुक पल में

धड़ाम

हाथ से छूटा

आस्था का अस्थि-पंजर फूट गया

कोई नहीं है, किसे पुकारूँ...

किससे कहूँ ... क्या करूँ ... ?

नपुंसक हुए तथ्यों की, आत्मज सत्यों की

नव-विधवा-सी स्थिति

न कोई सवाल

न जवाब

भयावनी चीखें

और कुछ नहीं

     

 - विजय निकोर

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by vijay nikore on May 27, 2015 at 4:05am

आदरणीय सौरभ भाई जी, 

आपसे मिली प्रतिक्रिया का सदैव इन्तज़ार रहता है... आपकी "सच्चाई" अच्छी लगती है।

हार्दिक धन्यवाद। सादर।

Comment by vijay nikore on May 27, 2015 at 4:02am

//आस्था का अस्थि-पंजर फूट गया... बहुत प्रभावी रचना हुई है//

मनोबल बढ़ाने के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय मोहन सेठी जी

Comment by vijay nikore on May 27, 2015 at 4:00am

 //एक अदृश्य दर्द ली हुई, पंक्तियाँ. भाव अंतर को भेद देते है//

सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय जितेन्द्र जी।

मनोबल बढ़ाए रखें। सादर।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on May 1, 2015 at 12:13pm

-आदरणीय निकोर जी / पूज्य अग्रज

आपने भले ही शीर्षक सैलाब लिखा है  और सच भी है . मई इस कविता को आगत भूकंप की त्रासदी से जोड़कर देखता हूँ तो हर अक्षर के अर्थ खुलते जाते है . भूकंप के बाद भयावह वर्षा हुयी थी तो सैलाब कहना भी सार्थक है  i यह कवित़ा  इतने पर ही समाप्त नहीं होती I  मेटाफर के रूप में यह जीवन -सन्दर्भों पर भी लागू होती है जीवन में कितने सैलाब आते है कितनी इच्छायें  मरती है i बहुत ही मर्मस्पर्शी  कवित़ा  i बागी जी ने सही कहा -आपकी कुछेक अच्छी रचनाओं में सहज ही यह कविता शामिल होगी i सादर .

Comment by Samar kabeer on May 1, 2015 at 10:57am
जनाब विजय निकोरे जी,आदाब, सुन्दर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें |

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 28, 2015 at 11:55pm

आदरणीय बड़े भाई विजय जी , सैलाब के आमने मनुष्य की नीरीह  स्थिति का बहुत मार्मिक चित्रण हुआ है , हार्दिक बधाइयाँ । 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 28, 2015 at 11:28pm

कविता देर तक वैचारिकता के समुन्द्र में डूबने उतराने पर मजबूर करती रही, आपकी कुछेक अच्छी रचनाओं में सहज ही यह कविता शामिल होगी, बहुत बहुत बधाई आदरणीय विजय निकोर जी.

Comment by Dr. Vijai Shanker on April 28, 2015 at 5:46pm
बड़ी गहराई से लिखा है आपने आदरणीय विजय निकोर जी , ये समस्त जीवन-दर्शन कहाँ सदैव जीवन पर लागू होते हैं , सब मन का एक बहलावा है , हर जीवन स्वयं में एक दर्शन है , और कुछ न कुछ नया दृष्टांत प्रस्तुत करता है , हम न देख पाएं यह अलग है। बहुत ही खूबसूरत रचना पर अनेकानेक बधाइयां , सादर।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 28, 2015 at 5:22pm

अघट के हो जाने के पश्चात तर्क नहीं अनुभूतियों की आरोप्य सच्चाई कितनी टीस भरी होती है ! आपकी संवेदना से उसे सटीक शब्द मिले हैं, आदरणीय विजयजी.

सादर शुभकामनाएँ. 

Comment by vijay nikore on April 28, 2015 at 4:34pm

 रचना की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय मिथिलेश जी।   

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