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मेरे पास, थोडे से बीज हैं

मेरे पास,
थोडे से बीज हैं
जिन्हे मै छींट आता हूं,
कई कई जगहों पे

जैसे,

इन पत्थरों पे,
जहां जानता हूं
कोई बीज न अंकुआयेगा
फिर भी छींट देता हूं कुछ बीज
इस उम्मीद से, शायद
इन पत्थरों की दरारों से
नमी और मिटटी लेकर
कभी तो कोई बीज अंकुआएगा
और बनजायेगा बटबृक्ष
इन पत्थरों के बीच

कुछ बीज छींट आया हूं
उस धरती पे,
जहां काई किसान हल नही चलाता
और अंकुआए पौधों को
बिजूका गाड़ कर
परिंदो से नही बचाता
जानता हूं, फिर भी
कुछ बीज अपने आप
पृकृति से हवा पानी
लेकर लहलहाएंगे
जंगली ही सही
कुछ फलफूल तो आयेंगे

कुछ बीज छींट आया हूं
बाल्कनी मे रखे गमलों मे
जिन्हे कोई रोज अपने हाथों से
निराई गुडाई करता है
और देता है जलार्ध्य
जिनमे निष्चित ही उगेंगे
कुछ खूबसूरत फल फूल
और बोन्साई

लेकिन,
अभी भी कुछ बीज बच रहे हैं
जिनके लिये तलाश है
एक उर्वरा और तैयार भूमि की
एक समर्पित किसान की

और,
कुछ बीज अपने अंदर भी रोप लिये हैं
अंकुआने के लिय,
कुछ और बीज इकटठा करने के लिये
.

मुकेश इलाहाबादी
मौलिक और अप्रकाशित

Views: 761

Comment

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Comment by vandana on December 27, 2014 at 6:16am

आशावादी सोच की इस रचना का सादर अभिनन्दन आदरणीय मुकेश जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 16, 2014 at 11:29pm

एक समृद्ध सोच से उपजी इस रचना के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ, भाई मुकेशजी.




प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on November 27, 2014 at 11:19am

बहुत ही भावपूर्ण प्रस्तुति। बहुत खूब भाई मुकेश इलाहाबादी जी

Comment by MUKESH SRIVASTAVA on November 24, 2014 at 2:16pm

BAHUT BAHTU SHUKRIAA AUR AABHAAR - RACHNAA PASANDGEE KE LIYE - DR, PRACHI JEE , LAXMAN DHAMANEE JEE, GIRIRAJ JEE, ER, GANESH JEE, RAJESH KUMARI JEE, MAHRISHI TRIPATHI JEE, GOPAL NARAYAN JEE, SHYAAM NARAYAN VERMAA JEE AUR SABHEE MITRA GAN


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on November 24, 2014 at 11:55am

आदरणीय मुकेश जी 

सद्भाव के बीज पथरीली, बंजर, उर्वरा हर भूमि पर छिटकाने ही चाहिए... समयानुरूप नमी लेकर लहलहा ही उठते हैं 

बधाई इस प्रस्तुति पर 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 24, 2014 at 11:25am

आ. मुकेश भाई ,इस सुन्दर  कविता के लिए  हार्दिक बधाई ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 24, 2014 at 5:55am

आ, मुकेश भाई , बढिया कविता हुई है , हार्दिक बधाई ।


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 23, 2014 at 5:20pm

आदरणीय मुकेश जी, अच्छी कविता हुई है, अंतिम स्टेंजा प्रभावशाली है, टंकण की त्रुटियां चुभती है, बधाई इस प्रस्तुति पर .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 22, 2014 at 6:24pm

और,
कुछ बीज अपने अंदर भी रोप लिये हैं
अंकुआने के लिय,
कुछ और बीज इकटठा करने के लिये-----इन पंक्तियों ने रचना को और ऊँचाइयाँ प्रदान की है |बहुत बढ़िया प्रस्तुति  ..बधाई आपको आ० मुकेश श्रीवास्तव जी 

Comment by maharshi tripathi on November 22, 2014 at 6:14pm
इन पत्थरों पे,
जहां जानता हूं
कोई बीज न अंकुआयेगा
फिर भी छींट देता हूं कुछ बीज
इस उम्मीद से, शायद
इन पत्थरों की दरारों से
नमी और मिटटी लेकर
कभी तो कोई बीज अंकुआएगा
और बनजायेगा बटबृक्ष
इन पत्थरों के बीच


क्या बात है ,बहुत खूब सर

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