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किंचित तो गुरुता नहीं, अन्तरमन में शेष।
लेकिन बैठे छद्म कर, धारण गुरु का वेश॥  
धारण गुरु का वेश, विषयरत कामी–लोभी।
लेकर प्रभु का नाम, लूट लेते प्रभु को भी॥
करुणाकर भी सोच, सोच कर होंगे चिंतित।
रच कर मानुष-वर्ण, भूल कर बैठा किंचित!!


_______मौलिक / अप्रकाशित________

- संजय मिश्रा 'हबीब'

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Comment by Sanjay Mishra 'Habib' on September 9, 2013 at 10:43am

कुण्डलिया की सराहना हेतु आप सभी सम्माननीय मित्रगण सादर आभार/अभिवादन स्वीकारें....

Comment by Dr Ashutosh Mishra on September 4, 2013 at 5:17pm

अति सुंदर व्यंग्य ..अति सुदर कुंडली ..बधाई

Comment by vijay nikore on September 4, 2013 at 1:22pm

अति सुन्दर व्यंग। आपको हार्दिक बधाई।

सादर,

विजय निकोर

Comment by बृजेश नीरज on September 4, 2013 at 1:22pm

बहुत सुन्दर कुण्डलियां! आपको हार्दिक बधाई!

Comment by विजय मिश्र on September 4, 2013 at 1:06pm
किंचित आपकी कुण्डलियों में जो कुण्डली मार कर बैठा है वह है अंध शिष्यों द्वारा फैशन में देखा-देखी पींग हाँकने केलिए गए-बीतों को गुरु की मर्यादा देना और सोसल स्टेटस फोर्मेसन के चक्कर में आडम्बरी छद्मावरण धारीयोंका गुरु रूप में वरन और .... फिर भुगतिये सत्यानाश . इसे आधुनिक साहित्य में 'अंध गुरु अध्याय' से चिन्हित करना चाहिए .जीवन नाटक होता जा रहा है ,स्वार्थ जो न करा ले इस अंधानुकरण के दौर में . विवेकी रचना के लिए बधाई संजयजी .
Comment by पीयूष द्विवेदी भारत on September 4, 2013 at 8:02am

बढ़िया प्रस्तुति ! बधाई, संजय भाई जी !

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on September 3, 2013 at 9:56pm

आ0 संजय हबीब भाई जी,  सादर प्रणाम!   वाह!...  बहुत सुन्दर कुण्डलियां।   हार्दिक बधाई स्वीकारें।  सादर,

Comment by AVINASH S BAGDE on September 3, 2013 at 8:46pm

किंचित तो गुरुता नहीं, अन्तरमन में शेष।
लेकिन बैठे छद्म कर, धारण गुरु का वेश॥  
धारण गुरु का वेश, विषयरत कामी–लोभी। 
लेकर प्रभु का नाम, लूट लेते प्रभु को भी॥ संजय मिश्रा 'हबीब' ji sateek...

!!



Comment by रविकर on September 3, 2013 at 7:18pm

आदरणीय संजय जी की जबरदस्त कुण्डलिया -
आभार आदरणीय-
आपकी रचनाएं नियमित पढने को मिलती रहेंगी- -
सादर

नाजुक अंगों को छुवे, करे वासना शान्त |
बने कान्त एकांत में, होय क्वारपन क्लांत |

होय क्वारपन क्लांत, बुद्धि से संत अपाहिज |
बढे दरिन्दे घोर, हुआ अब भारत आजिज |

बड़ी सजा की मांग, सुरक्षा से है तालुक |
मात पिता जा जाग, परिस्थिति बेहद नाजुक |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 3, 2013 at 5:58pm

आदरणीय संजय भाई , आपकी कुंडलिया ने सही समय मे सही चोट की है !! लाजवाब !! बधाई !!

कृपया ध्यान दे...

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