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ग़ज़ल- शिवाला लगा

122 122 122 12

1 तुझे जिसके लहज़े में ताना लगा

मुझे दिल से वो शख़्स सच्चा लगा

 2 ये मत पूछ क्या उसमें अच्छा लगा

 वो मासूम इक ज़िद्दी बच्चा लगा

3 तू सुन शोर पहले मेरे दिल का फिर

 बता क्यों तुझे मैं अकेला लगा

 4 बता वास्ता उससे रक्खूँ भी क्यों

 मुझे आदमी जब वो झूठा लगा

 5 थी कुछ बात या इश्क़ का था सरूर

हरिक चेहरा जो मुझको तेरा लगा

 6 मुहब्बत ही की है गुनह तो नहीं

जो पीछे मेरे यह ज़माना लगा

7 करूँ क्यों न उस प ज़ियाद: यकीं

मुझे जिसका दिल इक शिवाला लगा

8 करूँ भी तो किससे शिकायत करूँ

वजूद अपना ही जब पराया लगा

9 जिसे दोस्त "निर्मल" कहा उम्र भर

मुझे साथी वो दुश्मनों का लगा

जिसे दोस्त "निर्मल" कहा उम्र भर

"वो साथी मुझे दुश्मनों का लगा"

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on September 10, 2021 at 10:23am

अच्छी ग़ज़ल कही है आदरणीया...बधाई

Comment by Rachna Bhatia on September 1, 2021 at 9:25am

आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर भाई, हौसला बढ़ाने के लिए धन्यवाद। 

Comment by Rachna Bhatia on September 1, 2021 at 9:24am

आदरणीय समर कबीर सर् नमस्कार। सर्, आपकी इस्लाह के अनुसार पोस्ट में एडिट कर दिया है। एडिट करते ही पोस्ट रिअप्रूवल में चली गई थी। इसलिए जवाब नहीं दे पाई। 

सर् एक बार फिर क़ीमती इस्लाह देने के लिए बेहद शुक्रियः।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 1, 2021 at 6:41am

आ. रचना बहन सादर अभिवादन। सुन्दर गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Samar kabeer on August 31, 2021 at 9:48pm

फ़ेयर में सुधार के साथ मंच पर भी एडिट करना चाहिए आपको ।

Comment by Rachna Bhatia on August 31, 2021 at 8:41pm

आदरणीय समर कबीर सर् सादर नमस्कार। हौसला बढ़ाने के लिए आभार। आपने बहुत अच्छी इस्लाह दी ।फेयर में सुधार कर लेती हूँ।

बेहद शुक्रिय:।

Comment by Samar kabeer on August 31, 2021 at 3:45pm

मुहतरमा रचना भाटिया जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें ।

'मुझे साथी वो दुश्मनों का लगा'

"वो साथी मुझे दुश्मनों का लगा"

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