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Bhasker Agrawal
  • Male
  • अलीगढ, उत्तर प्रदेश
  • India
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Male
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aligarh
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Raghuveer puri
Profession
student

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इंसानों की दुकान

दुनिया को दुनिया क्यों कहते हैं ?

इंसानों की दुकान क्यों नहीं कहते ?

जहाँ इंसान बिकते हैं..

बिकते हैं कुछ हो बेआबरू यहाँ, कुछ हैं जो होकर महान बिकते हैं..

देते हजारों को गुलामी ये जन ,खुदको शहंशाह मान बिकते हैं..

लो हो गयीं शख्सियतें कीमती, खरीदो ये महंगे सामान बिकते हैं..

हो गए हैं जिंदगी से खाली शायद, जिस्म बिकते हैं जैसे मकान बिकते हैं..

पूछा तो बोले इसमें शर्म कैसी, हमें फक्र है हम सीना तान बिकते हैं..

देखी जो जमीं की…

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Posted on December 2, 2011 at 4:00pm — 2 Comments

अन्ना - अराजकता या संशोधन

मैं कई लोगों के मुंह से सुन चुका हूँ के अन्ना हजारे के आंदोलन से अराजकता की स्तिथि पैदा हो रही है या हो सकती है

 

तो में उन लोगों से पूछना चाहता हूँ के अराजकता का मतलब क्या है

ये जो ६५ साल से भारत की ज्यादातर जनता को भ्रष्टाचार के कारण संघर्षपूर्ण जीवन जीना पड़ता है, क्या ये अराजकता नहीं है

क्या ये जो कमजोर कानूनों का ढाल बनाकर भ्रष्ट लोग कानून की ही धच्चियाँ उड़ाते हैं, क्या ये अराजकता नहीं है

इन जैसे लोगों ने किताबी जानकारी तो काफी ले ली हैं पर इनको…

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Posted on August 19, 2011 at 10:00pm

खाना नहीं पर गाना जरूर

अगर दुनियां में आज लोग दुखी हैं तो उसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार में उन जैसे लोगों को मानता हूँ जो खाते कम गाते ज्यादा हैं



आप बहुचर्चित food shows का उदाहरण ले सकते हैं जिसमें आपको आसानी से एक महिला या पुरुष दिख जायेगा जो खाना चखने के दौरान अजीब अजीब आवाजें निकालना शुरू कर देता हैं

उनके चटकारे देखकर, देखने वाले मनुष्य को अपना अच्छा खासा स्वादिष्ट भोजन भी कम स्वादिष्ट लगने लगे इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं



किसी महापुरुष से सुना था के मनुष्य इस बात से दुखी नहीं के उसके घर… Continue

Posted on June 23, 2011 at 7:30pm — 4 Comments

खिड़की के उस तरफ

इक छोटा सा पंछी मेरे कमरे की खिड़की के बराबर से गुजरते तारों पे बैठा रहता है दिनभर

हर वक्त मौन सा रहता,

निहारता सामने के बागों को,

इमारतों पे सर पटकती किरणों को,

परदेसी पवन के झोकों को हरे वृक्षों से आलिंगन करते हुए ..



कभी कभी जो में खिडकी के पास आता हूँ उसे देखने, तो वो मेरी तरफ मुड़कर बैठ जाता है

लगता है जैसे अपनी शांत आखों से मेरे अशांत चित्त को देखकर कह रहा हो

के तुम भी हो कुछ मेरे जैसे वहाँ खिड़की के उस तरफ

फर्क है इतना के तुम हो अपने में ही उलझे… Continue

Posted on May 6, 2011 at 5:07pm — 2 Comments

Comment Wall (8 comments)

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At 10:58am on August 24, 2011,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

At 9:04pm on December 26, 2010, Admin said…
भाष्कर जी, लिंक की जानकारी केवल नियमों से परिचय कराना है, इसे अन्यथा ना लें | यह सामान्य सा प्रक्रिया है , OBO चाहता है कि सभी फनकार OBO के प्रकाशन नियमावली से परिचित हो जाये तथा अपनी पोस्ट को नियमों के दायरे मे ही पोस्ट करे, धन्यवाद  |
At 7:04pm on December 26, 2010, Admin said…

आदरणीय भाष्कर जी, सादर अभिवादन !

कृपया नीचे दिया गया लिंक अवश्य पढ़े, धन्यवाद |

http://www.openbooksonline.com/page/notice-1

At 3:17pm on December 17, 2010,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…
At 6:50pm on December 13, 2010, Abhay Kant Jha Deepraaj said…

 भास्कर जी, भाव वस्तुतः उच्च है ......अभय दीपराज

At 10:07am on December 13, 2010, Admin said…

At 7:44pm on November 30, 2010, PREETAM TIWARY(PREET) said…

At 1:40pm on November 30, 2010, Ratnesh Raman Pathak said…

 
 
 

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yesterday
Mahendra Kumar commented on अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी's blog post ग़ज़ल (उठाओ जितनी भी चाहे क़सम ज़माने की)
"अच्छी ग़ज़ल हुई है आ. अमीरुद्दीन जी। हार्दिक बधाई प्रेषित है। "
yesterday

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