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खिड़की के उस तरफ

इक छोटा सा पंछी मेरे कमरे की खिड़की के बराबर से गुजरते तारों पे बैठा रहता है दिनभर
हर वक्त मौन सा रहता,
निहारता सामने के बागों को,
इमारतों पे सर पटकती किरणों को,
परदेसी पवन के झोकों को हरे वृक्षों से आलिंगन करते हुए ..

कभी कभी जो में खिडकी के पास आता हूँ उसे देखने, तो वो मेरी तरफ मुड़कर बैठ जाता है
लगता है जैसे अपनी शांत आखों से मेरे अशांत चित्त को देखकर कह रहा हो
के तुम भी हो कुछ मेरे जैसे वहाँ खिड़की के उस तरफ
फर्क है इतना के तुम हो अपने में ही उलझे और मेरे लिए सारा जहान है..

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Comment

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Comment by Bhasker Agrawal on May 14, 2011 at 1:46am
धन्यवाद वंदना जी
धन्यवाद सौरभ जी

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 12, 2011 at 3:04pm

एक अच्छे प्रयास के लिये बधाई.

वयस-विशेष में संसार भी आपबीती का पर्याय लगता है, भले यह संसार है. .. गोया, तुम सुखी तो हम सुखी.. तुम दुखी तो हम भी वही..  

 

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