For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

खुद से बाहर निकल नही सकता
बर्फ हूँ पर पिघल नही सकता

मेरे अंदर दबा है ज्वालामुखी
आग लेकिन उगल नही सकता

तेरी आँखे बदल भी सकती हैं
मेरा चेहरा बदल नही सकता

मुझ को मिट्टी मे तुम मिला भी दो
तेरे साँचे मे ढल नही सकता

मुक्त आकाश का मैं पंछी हूँ
किसी पिंजरे मे पल नही सकता

Views: 542

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on June 8, 2010 at 4:35pm
Ek ek shayer anmol moti hai. Bahut hi aala mayaar ghazal hai Fauzan bhai - Jai Ho.
Comment by fauzan on May 27, 2010 at 8:39pm
Aap sabhi doston ka bahut 2 dhanyawad
Comment by विवेक मिश्र on May 25, 2010 at 12:33pm
nice thoughts... keep it up..
Comment by satish mapatpuri on May 24, 2010 at 4:46pm
तेरी आँखे बदल भी सकती हैं
मेरा चेहरा बदल नही सकता
मुक्त आकाश का मैं पंछी हूँ
किसी पिंजरे मे पल नही सकता फौज़ान भाई, बेहतरीन ग़ज़ल है, शुक्रिया.

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 23, 2010 at 10:23am
खुद से बाहर निकल नही सकता
बर्फ हूँ पर पिघल नही सकता,

मुक्त आकाश का मैं पंछी हूँ
किसी पिंजरे मे पल नही सकता,

Behtarin ghazal kaha hai Fauzan bhai, aapka jabaab nahi hai, sabhi line bhawpurna hai, bahut badhiya, upar coat kiyey gayey share mujhey kafi achhey lagey shayad wo merey life ko touch kar raha hai,shukriya ees sasakt abhivyakti key liyey,
Comment by Biresh kumar on May 23, 2010 at 12:05am
मेरे अंदर दबा है ज्वालामुखी
आग लेकिन उगल नही सकता
aag laga di janab ne
bahut khub bhai!!!!!!!!!!
Comment by PREETAM TIWARY(PREET) on May 22, 2010 at 11:54pm
खुद से बाहर निकल नही सकता
बर्फ हूँ पर पिघल नही सकता

मेरे अंदर दबा है ज्वालामुखी
आग लेकिन उगल नही सकता
waah fauzan bhai waah.........bahut khub gazal likha hai aapne....
Comment by Kanchan Pandey on May 22, 2010 at 2:21pm
Bahut badhiya , Sir mai aapki har Gazhal padhti hu, aap bahut badhiya likhatey hai,

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on May 22, 2010 at 1:08pm
बहुत लाजवाब गजल है फौजान भाई ! बहर ज़रूर छोटी है मगर ख्याल बहुत ही बुलंद हैं ! लेकिन मकते से पहले वाले शे'अर का पहला मिसरा एक दफा फिर से आपकी नज़रेसानी मांगता है, झरना यहाँ आकर थोड़ी रवानी खो रहा महसूस होता है !
Comment by दुष्यंत सेवक on May 22, 2010 at 11:29am
कामयाबी ही रास आती है मुझको, किसी और चीज़ से मैं बहल नही सकता....
उम्दा, बेहतरीन, बेनज़ीर, शानदार, फ़ौज़ान भाईजान आपकी पंक्तियाँ तो सीधे अंतस में उतर जाती है......ये जो दो पंक्तियाँ है मुझे आपके लिए ध्यान आ गई तो मैने आपकी ग़ज़ल के काफ़िए में ही बढ़ने की ज़ुर्रत की है, आशा है आप अन्यथा नही लेंगे....

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna posted blog posts
4 hours ago
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय Jaihind Raipuri जी,  अच्छी ग़ज़ल हुई। बधाई स्वीकार करें। /आयी तन्हाई शब ए…"
5 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on रामबली गुप्ता's blog post कर्मवीर
"कर्मवीरों के ऊपर आपकी छांदसिक अभिव्यक्ति का स्वागत है, आदरणीय रामबली गुप्त जी.  मनहरण…"
10 hours ago
Jaihind Raipuri posted a blog post

ग़ज़ल

2122    1212    22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत मेंक्या से क्या हो गए महब्बत में मैं ख़यालों में आ गया उस…See More
15 hours ago
Jaihind Raipuri commented on Admin's group आंचलिक साहित्य
"कुंडलिया छत्तीसगढ़ी छत्तीसगढ़ी ह भाखा, सरल ऐकर बिधान सहजता से बोल सके, लइका अऊ सियान लइका अऊ…"
15 hours ago
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . रिश्ते
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय "
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

तब मनुज देवता हो गया जान लो,- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२/२१२/२१२/२१२**अर्थ जो प्रेम का पढ़ सके आदमीएक उन्नत समय गढ़ सके आदमी।१।*आदमीयत जहाँ खूब महफूज होएक…See More
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . रिश्ते
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। सुंदर दोहै हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
yesterday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . . रिश्ते

दोहा पंचक. . . . रिश्तेमिलते हैं  ऐसे गले , जैसे हों मजबूर ।निभा रहे संबंध सब , जैसे हो दस्तूर…See More
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन व आभार।"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आ. भाई रवि जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और सुंदर सुझाव के लिए हार्दिक आभार।"
Saturday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"बेशक। सच कहा आपने।"
Saturday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service