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ये अंधकार ये वातावरण जो भय का है.
यही समय तो नये सूर्य के उदय का है.

ये ज़िंदगी का बही जाने किस समय का है.
ना इसमे आय का व्योरा ना कोई व्यय का है.

परास्त हो के भी अब मन मेरा उदास नही.
किअबकी हार मे भी स्वाद कुछ विजय का है.

भटक रहा हूँ जो जीवन के इस मरुस्थल मे
है इसमे दोष किसी का तो बस समय का है.

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Comment by Khushboo on May 21, 2010 at 10:50am
ये ज़िंदगी का बही जाने किस समय का है.
ना इसमे आय का व्योरा ना कोई व्यय का है.
bahut badhiya fauzan jee.....keep it up.
Comment by PREETAM TIWARY(PREET) on May 21, 2010 at 10:49am
ये अंधकार ये वातावरण जो भय का है.
यही समय तो नये सूर्य के उदय का है.
bahut hi shaandarnfauzan sahab.....bahut acchha likhte hain aap...

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on May 21, 2010 at 9:47am
सुभान अल्लाह फौजान भाई ! एक और उम्दा गजल, ख्याल बुलंद, अंदाज़ निराला, भाषा सुंदर - जवाब नहीं ! ऐसी ज़मीन पर शे'र कहना आप ही के बूते कि बात है सर ! इस के आगे नि:शब्द हूँ !

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 21, 2010 at 7:45am
परास्त हो के भी अब मन मेरा उदास नही.
कि अबकी हार मे भी स्वाद कुछ विजय का है.

वाह फ़ौज़ान भाई वाह, बहुत ही बढ़िया कहा है,अच्छी ग़ज़ल ,
Comment by Admin on May 20, 2010 at 11:47pm
भटक रहा हूँ जो जीवन के इस मरुस्थल मे
है इसमे दोष किसी का तो बस समय का है.

फौजान साहिब एक मर्तबा फिर से आपने एक उम्द्दा ग़ज़ल का दीदार कराया है, बहुत बहुत शुक्रिया,

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