For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

गीतिका .....8 + 8---निगाहें

आँज गगन का नील निगाहें

लगती गहरी झील  निगाहें

 

माँस बदन पर दिख जाये तो

बन जाती है चील निगाहें

 

आन टिकी है मुझ पर सबकी

चुभती पैनी कील निगाहें

 

बंद गली के उस नुक्कड़ पर

करती है क्या डील निगाहें

 

इक पल में तय कर लेती है

यार हज़ारों मील निगाहें

 

बाँध सकेगा मन क्या इनको

देती मन को ढील निगाहें

 

दिखने दे ‘खुरशीद’ नज़ारे

किरणों से मत छील निगाहें 

मौलिक व अप्रकाशित 

Views: 755

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by khursheed khairadi on February 19, 2015 at 9:49am

आदरणीय महर्षि त्रिपाठी जी ,आदरणीय सोमेश जी ,हृदय तल से आभार |सादर |

Comment by Hari Prakash Dubey on February 19, 2015 at 8:31am

 आदरणीय खुर्शीद खैरादी जी ,बहुत सुन्दर ,

बंद गली के उस नुक्कड़ पर

करती है क्या डील निगाहें//...वाह,  बधाई, सादर।

Comment by Dr. Vijai Shanker on February 19, 2015 at 3:24am
इक पल में तय कर लेती है , यार हज़ारों मील निगाहें
बाँध सकेगा मन क्या इनको , देती मन को ढील निगाहें ॥
वाह, सुन्दर , बहुत सुन्दर , आदरणीय खुर्शीद खैरादी जी , बधाई, सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 19, 2015 at 12:05am

आदरणीय खुर्शीद सर बेहतरीन ग़ज़ल हुई है शेर दर शेर दाद कुबूल फरमाए. सभी अशआर एक से बढ़कर एक है .... क्या कमाल का काफिया लिया है, आपकी ग़ज़लों का इसीलिए दीवाना हूँ.... ...... आपकी ग़ज़ल पर ही तरही ग़ज़ल का प्रयास कर रहा हूँ आपकी ग़ज़ल के हवाले से ये चंद अशआर आपको  सादर समर्पित  है -

क्या क्या करती फील निगाहें 

गीली गीली सील निगाहें  

तेरी बातें, मेरी बातें 

करती है तफसील निगाहें 

खुशियाँ खुशियाँ केवल खुशियाँ 

कितनी है तहवील निगाहें 

मेरी बातें सुनकर ऐसे 

मत करिए तब्दील निगाहें 

इस दिल से उस  दिल तक बातें 

करती है तामील निगाहें 

कोमल दिल को रोज डराती 

"चुभती पैनी कील निगाहें"

Comment by Samar kabeer on February 18, 2015 at 10:53pm
जनाब ख़ुर्शीद जी,आदाब,मतला कुछ कमज़ोर लग रहा है,ग़ज़ल के बाक़ी अशआर बहुत ख़ूब हैं,मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं |

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 18, 2015 at 8:29pm

बहुत सुन्दर वाह्ह्ह निगाहों के हर हुनर को गीतिका में बांधा है बहुत अच्छी लिखी है बहुत बहुत बधाई ,बहुत पहले मैंने आँखों के ऊपर इसी तरह कुछ लिखा था बरबस ही  याद आ गया. 

Comment by somesh kumar on February 18, 2015 at 6:39pm

निगाहों ने निगाहों से 

ईशारों ही इशारों में 

बयाँ कर दी सभी बातें 

ओठों पे थी पाबंदी 

निगाहों  ने हद तोड़ी 

टूटी थी जो कड़ियाँ 

निगाहों ने फिर जोड़ी |

निगाहों में सजा सपना 

असम्भव कुछ नहीं छोड़ा 

नयन सारथी पे बैठ 

,मन दूर तक दौड़ा |

एक सहज सी प्रतिक्रिया आपकी निगाहों के नाम |सुंदर गीतिका पर बधाई |

Comment by maharshi tripathi on February 18, 2015 at 6:00pm

अच्छी  रचना  आ. खुर्सीद जी |

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna posted a blog post

दोहा सप्तक. . . . घूस

दोहा सप्तक. . . . . घूसबिना कमीशन आजकल, कब होता है काम ।कैसा भी हो काम अब, घूस हुई है आम ।।घास घूस…See More
yesterday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा सप्तक. . . . प्यार

दोहा सप्तक. . . . प्यारप्यार, प्यार से माँगता, केवल निश्छल प्यार ।आपस का विश्वास ही, इसका है आधार…See More
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ. भाई चेतन जी, उत्साहवर्धन व स्नेह के लिए आभार।"
Sunday
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय "
Sunday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ.लक्ष्मणसिह धानी, 'मुसाफिर' साहब  खूबसूरत विषयान्तर ग़ज़ल हुई  ! हार्दिक …"
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ. भाई चेतन जी, सादर अभिवादन। प्रदत्त विषय पर सुंदर मुक्तक हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। प्रदत्त विषय पर सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। प्रदत्त विषय पर सुंदर गजल हुई है। हार्दिक बधाई।"
Sunday
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"ग़ज़ल   बह्र ए मीर लगता था दिन रात सुनेगा सब के दिल की बात सुनेगा अपने जैसा लगता था…"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

हरकत हमें तो वैद की रखती तनाव में -लक्ष्मण धामी 'मुसफिर'

बदला ही राजनीति के अब है स्वभाव में आये कमी कहाँ  से  कहो  फिर दुराव में।१। * अवसर समानता का कहे…See More
Saturday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
" दोहा मुक्तक :  हिम्मत यदि करके कहूँ, उनसे दिल की बात  कि आज चौदह फरवरी, करो प्यार…"
Saturday
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"दोहा एकादश. . . . . दिल दिल से दिल की कीजिये, दिल वाली वो बात । बीत न जाए व्यर्थ के, संवादों में…"
Saturday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service