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अहीर छंद "प्रदूषण"

बढ़ा प्रदूषण जोर।
इसका कहीं न छोर।।
संकट ये अति घोर।
मचा चतुर्दिक शोर।।

यह दावानल आग।
हम सब पर यह दाग।।
जाओ मानव जाग।
छोड़ो भागमभाग।।

मनुज दनुज सम होय।
मर्यादा वह खोय।।
स्वारथ का बन भृत्य।
करे असुर सम कृत्य।।

जंगल करत विनष्ट।
सहे जीव-जग कष्ट।।
प्राणी सकल कराह।
भरते दारुण आह।।

यंत्र-धूम्र विकराल।
ज्यों यह विषधर व्याल।।
जकड़ जगत निज दाढ़।
विपदा करे प्रगाढ़।।

दूषित वायु व नीर।
जंतु समस्त अधीर।।
संकट में अब प्राण।
उनको कहीं न त्राण।।

प्रकृति-संतुलन ध्वस्त।
सकल विश्व अब त्रस्त।।
अन्धाधुन्ध विकास।
आया जरा न रास।।

विपद न यह लघु-काय।
पर अब जग-समुदाय।।
मिलजुल करे उपाय।
तब यह टले बलाय।।

(यह 11 मात्रा का छंद है जिसका अंत जगण 121 से होना आवश्यक है)

मौलिक व अप्रकाशित

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on April 25, 2019 at 8:55pm

बहुत खूबसूरत छंद बहुत सुन्दर निर्वाह 
हार्दिक बधाई 

Comment by Samar kabeer on April 23, 2019 at 3:06pm

जनाब बासुदेव अग्रवाल 'नमन'जी आदाब, अच्छे छन्द हुए हैं,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on April 20, 2019 at 8:51am

आ0 सुशील सारना जी आपका बहुत बहुत आभार।

Comment by Sushil Sarna on April 18, 2019 at 8:02pm

आदरणीय वासुदेव जी अति सुंदर और प्रवाहमयी सृजन के लिए दिल से बधाई ।

Comment by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on April 18, 2019 at 4:05pm

आ0 गोपाल नारायण जी आपका बहुत बहुत आभार।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 18, 2019 at 1:40pm

आ०, ग्यारह सम मात्रिक छंद जिसके प्रत्येक चरणात में १२१ अनिवार्य का कुशल निर्वाह  i इस छंद की एक धुन भी है ,जिसमे प्रवाह होता है जैसे 

ओ मेरे मनमीत 

दिल मेरा तू जीत 

गा जीवन के गीत 

मुझे मिले नवनीत 

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