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इस  बार  तेरे  शहर  में  परछाइयाँ जलीं - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"(गजल)

२२१/२१२१/१२२१/२१२

सुनते हैं खूब न्याय  की  सच्चाइयाँ जलीं
कैसा अजब हुआ है कि अच्छाइयाँ जलीं।१।


वर्षों पुरानी बात है जिस्मों का जलना तो
इस  बार  तेरे  शहर  में  परछाइयाँ जलीं।२।


कितने हसीन ख्वाब  हुये खाक उसमें ही
ज्वाला में जब दहेज की शहनाइयाँ जलीं।३।


सब कुछ यहाँ जला है, तेरी बात से मगर
हाकिम कभी वतन में न मँहगाइयाँ जलीं।४।


जिसमें मिलन की बास थी नफरत घुली वहाँ
साजिश ये किसकी  यार  जो पुरवाइयाँ जलीं।५।


कितनी तड़प है देख ले बिरहन के भाग में
सावन बुझी न  जेठ  की  तनहाइयाँ जलीं।६।


सोचा था खूब छाँव  में अब तो रहेंगे पर
साजन के  गाँव  धूप  में  रानाइयाँ जलीं।७।


बदला है वक़्त भाग से  उसका भी देखिये
हँस कर जो देखा आपने रुसवाइयाँ जलीं।८।

मौलिक-अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

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Comment

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Comment by Samar kabeer on October 29, 2018 at 10:13pm

बहुत बहुत शुक्रिया भाई विजय निकोर जी ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 29, 2018 at 12:44pm

आ भाई विजय निकोर जी, सादर अभिवादन। गजल पर आपके रुख से लेखन सफल हुआ । स्नेह के लिए आभार ।

Comment by vijay nikore on October 28, 2018 at 1:37am

भाई समर कबीर जी, आपकी सुविचारित प्रतिक्रियाओं से सदैव बहुत कुछ सीखने को मिलता है। आपका आभार। सादर।

विजय निकोर

Comment by vijay nikore on October 28, 2018 at 1:32am

आपकी गज़ल बहुत ही पसन्द आई। बधाई आदरणीय लक्ष्मण जी

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 27, 2018 at 7:17am

आ. भाई अजय जी, सादर अभिवादन।गजल की प्रशंसा के लिए आभार । मार्गदर्शन करते रहिए...

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 27, 2018 at 7:15am

आ. भाई नवीन जी, गजल पर उपस्थिति और स्नेह के लिए धन्यवाद।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 27, 2018 at 7:14am

आ. भाई समर जी, सादर अभिवादन । गजल की प्रशंसा और विस्तारित सुझावों के लिए हार्दिक आभार । यथोचित सुधार किये देता हूँ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 26, 2018 at 8:00pm

वाह आदरणीय बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल कही है..लाजबाब

Comment by Ajay Tiwari on October 26, 2018 at 5:13pm

आदरणीय लक्ष्मण जी, बहुत अच्छे अशआर  हुए  हैं. हार्दिक बधाई.

Comment by Naveen Mani Tripathi on October 26, 2018 at 1:14pm

आ0 लक्ष्मण धामी साहब बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई ।

सुनते हैं खूब न्याय "की "

सावन पुलिंग है 

कृपया ध्यान दे...

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