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पढ़ो तो इसको’ फाड़ो मत- गजल

© बसंत कुमार शर्मा

मापनी - १२२२ १२२२ १२२२ १२२२ १२२२

 

सदा देता, न लेता कुछ, बुरी नजरों से ताड़ो मत

शजर है घर परिंदों का, उसे तुम यूँ उजाड़ो मत

 

बड़ी उम्मीद होगी, मगर कुछ भी न पाओगे

सयानी है बहुत जनता, यूँ मंचों पर दहाड़ो मत

 

वहाँ पत्थर ही पत्थर थे, न मिट्टी थी न पानी था

उगा है अपने दम पर वो, पनपने दो उखाड़ो मत

 

कभी तन्हा अगर हों तो सुकूं देती बहुत हमको

ज़ेहन में पर्त यादों की जमी रहने दो’ झाड़ो मत

 

कमाकर खर्च कर लेना या’ फिर दान में दे दो  

बड़े ही काम की दौलत जमीं में इसको’ गाड़ो मत

 

करो हासिल इसे मेहनत लगन ईमानदारी से  

इधर से या उधर से तुम ये सिंहासन जुगाड़ो मत

 

लिखी है आँसुओं से ये कहानी है मुहब्बत की

नहीं कागज ये’ कोरा है पढ़ो तो इसको’ फाड़ो मत

"मौलिक एवं अप्रकाशित"

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on October 18, 2018 at 1:26pm

आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' जी सादर नमस्कार, सही कहा आपने , वाकई हम हमेशा आदरणीय समर कबीर जी की इस्लाह से लाभान्वित होते रहते हैं . सादर नमन आपको 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on October 18, 2018 at 1:25pm

आदरणीय  Samar kabeer जी सादर नमस्कार, हमेशा की तरह आपकी शानदार इस्लाह को सादर नमन, आपसे इस मंच पर बहुत कुछ सीखने को मिलता है, इसी तरह हौसलाफजाई  करते रहें, दिल से बहुत बहुत धन्यवाद आपका 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on October 18, 2018 at 1:23pm

आदरणीय बृजेश कुमार 'ब्रज'   जी सादर नमस्कार, आपकी हौसलाफजाई का दिल  

से शुक्रिया 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on October 18, 2018 at 1:23pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'  जी सादर नमस्कार, आपकी हौसलाफजाई का दिल  

से शुक्रिया 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on October 18, 2018 at 1:22pm

आदरणीय Sheikh Shahzad Usmani जी सादर नमस्कार, आपकी हौसलाफजाई का दिल  

से शुक्रिया 

Comment by नाथ सोनांचली on October 16, 2018 at 4:05pm

आद0 बसन्त कुमार शर्मा जी सादर अभिवादन। ग़ज़ल का बेहतरीन प्रयास किया है आपने। आली जनाब समर साहब ने मिसरा दर मिसरा इस्लाह कर दी है। हमें भी सीखने को मिला और ग़ज़ल निखर भी गयी। इस प्रस्तुति पर आपको बधाई

Comment by Samar kabeer on October 14, 2018 at 11:04pm

जनाब बसंत कुमार शर्मा जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,लेकिन अभी समय चाहता है ।

पहली बात :-//मापनी - १२२२ १२२२ १२२२ १२२२ १२२२//इसमें आपने  पाँच बार1222 लिखा है,चार बार लिखें ।

'बड़ी उम्मीद होगी, मगर कुछ भी न पाओगे'

ये मिसरा बह्र से ख़ारिज है, देखें,मिसरा यों कर सकते हैं :-

'बड़ी उम्मीद होगी तुमको,लेकिन कुछ न पाओगे'

' 

वहाँ पत्थर ही पत्थर थे, न मिट्टी थी न पानी था

उगा है अपने दम पर वो, पनपने दो उखाड़ो मत'

इस शे'र के दोनों मिसरों में रब्त नहीं है,ऊला मिसरा यों कर सकते हैं:-

'यहाँ मिटटी न पानी है, मगर किल्ला तो फूटा है'

' 

कभी तन्हा अगर हों तो सुकूं देती बहुत हमको

ज़ेहन में पर्त यादों की जमी रहने दो’ झाड़ो मत'

इस शे'र के ऊला मिसरे में प्रवाह कुछ कमज़ोर है, और सानी मिसरा 'ज़ेहन'शब्द की वजह से बेबह्र हो रहा है, और दूसरी बात ये कि 'यादों की परत'? इस शे'र को यों कह सकते हैं :-

'कभी तन्हा अगर होंगे,सुकूँ बख्शेंगी ये हमको'

जमी जो ज़ह्न पर यादों की परतें,इनको झाड़ो मत'

' 

कमाकर खर्च कर लेना या’ फिर दान में दे दो  

बड़े ही काम की दौलत जमीं में इसको’ गाड़ो मत'

इस शे"र का ऊला मिसऱा बह्र में नहीं,इस शे'र को यों कह सकते हैं :-

'कमा कर ख़र्च करदो या किसी को दान में दे दो

बहुत काम आयेगी दौलत,ज़मीं में इसको गाड़ो मत'

लिखी है आँसुओं से ये कहानी है मुहब्बत की

नहीं कागज ये’ कोरा है पढ़ो तो इसको’ फाड़ो मत'

इस शे'र के दोनों मिसरों में रब्त नहीं है,इसे यों कर सकते हैं:-

'लिखी है आँसुओं से जो,कहानी है महब्बत की

करो कुछ क़द्र,सीने से लगाओ,इसको फाड़ो मत'

बाक़ी शुभ शुभ,इस् प्रस्तुति पर बधाई आपको ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 14, 2018 at 7:10pm

आदरणीय शर्मा जी बहुत ही खूब ग़ज़ल कही है..बधाई

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 14, 2018 at 3:22pm

आ. भाई बसंत जी, सादर अभिवादन । अच्छी गजल हुयी है , हार्दिक बधाई ।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on October 13, 2018 at 9:43pm

आदरणीय   V.M.''vrishty''  जी सादर नमस्कार , आपकी हौसलाअफजाई का बहुत बहुत शुक्रिया 

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