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आप आये अब हमें दिल से लगाने के लिए

जब न आँखों में बचे आँसू बहाने के लिए

 

छाँव जब से कम हुई पीपल अकेला हो गया  

अब न जाता पास कोई सिर छुपाने के लिए

 

तितलियाँ उड़ती रहीं करते रहे गुंजन भ्रमर

पुष्प में मकरंद था जब तक लुभाने के लिए

 

हम नदी से बह रहे हैं खुद बनाकर रास्ता

सिन्धु से कब चाह है आये बुलाने के लिए

 

दर्द में डूबे हुए कब तक गुजारें जिन्दगी

कुछ गमों को छोड़ना बेहतर ज़माने के लिए

"मौलिक एवं अप्रकाशित"

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on September 18, 2018 at 10:28am

आदरणीय  बृजेश कुमार 'ब्रज' जी शुभ प्रभात, आपका दिल से शुक्रिया 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on September 18, 2018 at 10:28am

आदरणीय रामबली गुप्ता जी शुभ प्रभातम, आपकी हौसलाफजाई का दिल से शुक्रिया 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on September 18, 2018 at 8:49am

वाह आदरणीय शर्मा जी...बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल कही...

Comment by रामबली गुप्ता on September 17, 2018 at 1:16pm

वाह भाई बसंत कुमार जी बहुत ही शानदार ग़ज़ल कही आपने हार्दिक बधाई स्वीकार करें।  सभी शैर बढियाँ हुए हैं लेकिन पहला और दूसरा शैर दोनों मुझे बहुत पसंद आये। तीसरे शेर में आद० समर भाई साहब का सुझाव बेहतर है। सादर

Comment by बसंत कुमार शर्मा on September 15, 2018 at 9:07pm

आदरणीया रक्षिता सिंह जी सादर नमस्कार , आपकी मनभावन प्रतिक्रिया का दिल से शुक्रिया 

Comment by रक्षिता सिंह on September 15, 2018 at 1:17pm

आदरणीय बसंत जी बहुत ही खूबसूरत गज़ल। बहुत बहुत बधाई

Comment by बसंत कुमार शर्मा on September 14, 2018 at 1:13pm

आदरणीय समर कबीर जी सादर नमस्कार, आपकी तरमीम से हमेशा ही कुछ न कुछ सीखने को मिलता है, बहुत बहुत शुक्रिया , यूँ ही स्नेह बनाये रखें 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on September 14, 2018 at 1:12pm

आदरणीय तेजवीर सिंह जी सादर नमस्कार, आपका दिल से शुक्रिया हौसला अफजाई के लिए 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on September 14, 2018 at 1:11pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'  सादर नमस्कार, आपकी मनभावन प्रतिक्रिया हेतु सादर आभार 

Comment by Samar kabeer on September 14, 2018 at 11:56am

जनाब बसंत कुमार शर्मा जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

हम नदी से बह रहे हैं खुद बनाकर रास्ता

सिन्धु से कब चाह है आये बुलाने के लिए'

इस शैर के ऊला मिसरे में 'से' की जगह "में" करना उचित होगा,और सानी मिसरे में ऐब-ए-तनाफ़ुर है 'चाह है' ,अगर मिसरा यूँ करलें तो ऐब निक्ल जायेगा:-

'चाह क़ब है सिन्धु से आये बुलाने के लिये'

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