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मन में ही हार, जीत मन में..

मन में ही हार, जीत मन में,
मन में ही अर्थ-अनर्थ लिखा,
लेखनी बदल दे मनोभाव,
तो समझो सत्य, समर्थ लिखा !

यदि प्रेम प्रस्फुटित हो मन में,
अनुराग परस्पर संचित हो,
नि:स्वार्थ भावना हो शाश्वत,
कोई भी नहीं अपवंचित हो,
जब हो समाज में रामराज्य,
तो समझो सार्थक अर्थ लिखा !

यदि छद्म भेष, छल दम्भ द्वेष,
मानव में ही घर कर जाये,
यदि राम कृष्ण की जन्मभूमि,
पर मानवता ही मर जाये,
यदि मन मलीन हो, जड़वत हो,
तो लगा, कदाचित् व्यर्थ लिखा !

मन में ही हार, जीत मन में,
मन में ही अर्थ-अनर्थ लिखा,
लेखनी बदल दे मनोभाव,
तो समझो सत्य, समर्थ लिखा !

अजय शर्मा " अज्ञात "
मौलिक एवं अप्रकाशित.

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 29, 2018 at 7:20pm

आ. भाई अजय जी, बेहतरीन कविता हुयी है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Ajay Kumar Sharma on August 18, 2018 at 9:09am

बसंत सर उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद...

Comment by बसंत कुमार शर्मा on August 18, 2018 at 8:51am

अह वाह उत्कृष्ट सृजन के लियेबहुत बहुत बधाई आपको 

Comment by Ajay Kumar Sharma on August 16, 2018 at 7:59am

आदरणीया नीलम जी एवं आदरणीया बबिता जी हार्दिक धन्यवाद...

Comment by babitagupta on August 15, 2018 at 4:03pm

बेहतरीन जीवन जीने व सामजिक मूल्यों का संदेश देती भाव पूर्ण बेहतरीन रचना,हार्दिक बधाई स्वीकार कीजियेगा आदरणीय सरजी। 

Comment by Neelam Upadhyaya on August 14, 2018 at 3:17pm

आदरणीय अजय कुमार जी,  नमस्कार।  बढ़िया रचना की प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें।

 

Comment by vijay nikore on August 12, 2018 at 3:02pm

अति भावपूर्ण रचना । आपको बधाई अजय जी।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on August 10, 2018 at 10:12pm

बेहतरीन संदेश वाहक बेहतरीन सृजन। हार्दिक बधाइयाँ जनाब अजय कुमार शर्मा साहिब।

Comment by Ajay Kumar Sharma on August 10, 2018 at 9:43pm

डॉ. गोपाल सर आप की सलाह सर माथे पर .

कोटिश: धन्यवाद.

Comment by Ajay Kumar Sharma on August 10, 2018 at 9:41pm

कबीर सर उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद...

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