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गजल- फिर कोई मीठी शरारत हो गई है

मापनी - 2122 2122 2122

 

आपसे इतनी मुहब्बत हो गई है

लोग कहते हैं कि आफत हो गई है

 

नींद मेरी हो न पायी थी मुकम्मल

फिर कोई मीठी शरारत हो गई है

 

ढूँढता है रोज मिलने का बहाना

आपकी इस दिल को’ आदत हो गई है

 

शुक्रिया जो आप मेरे घर पधारे    

रौशनी में और बर्कत हो गई है

 

सख्त पहरे हो गए राहों में जब से 

और भी मजबूत चाहत हो गई है

 

दिल को देकर दर्द ही पाया है लेकिन 

जिन्दगी अब खूबसूरत हो गई है

"मौलिक एवं अप्रकाशित"

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Comment

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Comment by Samar kabeer on June 29, 2018 at 7:58pm

जी,धन्यवाद ।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 29, 2018 at 4:57pm

आदरणीय Samar kabeer जी सदैव स्वागत है आपका 

Comment by Samar kabeer on June 18, 2018 at 11:08am

मेरे कहे को मान देने के लिए धन्यवाद ।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 18, 2018 at 9:57am

आदरणीय समर कबीर जी, आपकी इस्लाह का तहे दिल से शुक्रिया, यूँ ही स्नेह बनाये रखें, आवश्यक परिमार्जन कर लेता हूँ

सादर नमन आपको 

Comment by Samar kabeer on June 17, 2018 at 3:03pm

'रौशनी में और बर्कत हो गई है'

Comment by Samar kabeer on June 17, 2018 at 3:02pm

जनाब बसंत कुमार शर्मा जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

'ढूँढता हर रोज मिलने का बहाना'

इस मिसरे में ऐब-ए-तनाफ़ुर है 'हर रोज',इस मिसरे को यूँ कर लें तो ये ऐब निकल जायेगा:-

'ढूँढता है रोज़ मिलने का बहाना'

"शुक्रिया है, आप मेरे घर पधारे

रौशनी में कुछ इज़ाफ़त हो गई है'

इस शैर के ऊला मिसरे में 'है' शब्द भर्ती का है, और सानी मिसरे में 'इज़ाफ़त' क़ाफ़िया सहीह नहीं,'इज़ाफ़त' का अर्थ है निस्बत और एक कलमे को दूसरे से मिलाने के लिए जो ज़ेर (चिन्ह)लगाया जाता है,आपने इस शब्द को बढ़ोतरी के लिए समझा है जबकि बढ़ोतरी के लिए शब्द होता है "इज़ाफ़ा", इस शैर को यूँ कर सकते हैं :-

"शुक्रिया,जो आप मेरे घर पधारे

रौशनी और बर्कत हो गई है'

'दिल लिया है या दिया है कुछ भी कहिये'

इस मिसरे में भी ऐब-ए-तनाफ़ुर हे 'दिल लिया',इस मिसरे को यूँ कर लें तो ये ऐब निकल जायेगा :;

'दिल दिया है या लिया है कुछ भी कहिये'

बाक़ी शुभ शुभ ।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 16, 2018 at 12:23pm

आदरणीया  Rakshita Singh जी आपका दिल से शुक्रिया 

Comment by रक्षिता सिंह on June 15, 2018 at 2:58pm

आदरणीय बसंत जी नमस्कार,
बहुत ही बेहतरीन गजल, मुबारकबाद कुबूल कीजिए ।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 14, 2018 at 12:38pm

आदरणीय Mahendra Kumar जी दिल से शुक्रिया आपका 

Comment by Mahendra Kumar on June 13, 2018 at 7:52pm

ख़ूबसूरत ग़ज़ल है आदरणीय बसंत जी. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए इस लाजवाब प्रस्तुति पर. सादर.

कृपया ध्यान दे...

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