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आदमी एवं नदी (कविता )

आदमी और नदी

पहाड़ों से निकलतीं थीं झूम-झूम कर

खो जाती थीं एक-दुसरे में घूम-घूम कर

विशद् धारा बन जाती थी

 एक नदी कहलाती थी

समुंदर में जाकर प्रेम करती सुरूप

हो जाती एकरूप |

आदमी भी कुछ ऐसा था

स्वीकारता दुसरे को

चाहे दूसरा जैसा था

आदमी होना प्रथम था

बाद में ज़मीन-पैसा था |

आदमी का मेल-मिलाप /सभ्यता रचता था

इसी तरह एक राज्य/एक देश बसता था |

बाद में नदी को जरूरत के हिसाब से मोड़ा गया

उसे नहरों और फिर नालियों में तोड़ा गया |

आदमी भी जमीन-पैसे से बँटता गया

और अपने मूल स्वभाव से कटता गया |

नहरें बनने से सम्पन्नता आई/बंजर जमीने लहराईं 

पर नैसर्गिक जंगल खो गए/हरे मैदान बंजर हो गए |

पैसे-ज़मीन ने आदमी को कुनबे में बाँटा

गरीब-अमीर दलित-ठाकुर नस्लों में बाँटा

इससे लाभ कम हुआ और बढ़ गया घाटा |

आदमी आदमियत भूल कर सब कुछ हो गया है

नदी की तरह जन्मा नैसर्गिक आदमी

अपनी बनाई हुई नहरों में खो गया है |

सोमेश कुमार(मौलिक एवं अमुद्रित )

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Comment

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Comment by नाथ सोनांचली on March 11, 2018 at 6:05am

आद0 सोमेश जी सादर अभिवादन। बढिया कविता कही आपने, इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार कीजिये

Comment by Samar kabeer on March 8, 2018 at 10:02pm

जनाब सोमेश कुमार जी आदाब,सुंदर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 8, 2018 at 7:28pm

वाह बहुतखूब..बोलती हुई कविता लगी आपकी रचना..बधाई

कृपया ध्यान दे...

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