For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

मुश्क़िलों में दिल के भी रिश्ते - सलीम रज़ा

2122 2122 2122 212

.

मुश्किलों में दिल के भी रिश्ते पुराने हो गए
ग़ैर से क्या  हो गिला अपने  बेगाने हो गए
-
चंद दिन के फ़ासले के बा'द हम जब भी मिले

यूँ लगा जैसे  मिले  हमको ज़माने  हो गए
-
पतझड़ों  के साथ मेरे दिन गुज़रते थे कभी
आप के आने से मेरे  दिन  सुहाने हो  गए
-
मुस्कराहट उनकी  कैसे भूल पाएगें  कभी
इक नज़र देखा जिन्हें औ हम दिवाने हो गए
-
आँख में शर्म-ओ-हया, पाबंदियाँ, रुस्वाईयां

उनके न  आने  के  ये अच्छे बहाने हो गए
-
आज भी उनकी अदाओं में वही है शोखियाँ 
आज फिर उनकी गली में आने जाने हो गए   
-
अब भी है रग रग में क़ायम प्यार की ख़ुश्बू रज़ा
क्या हुआ जो  ज़िस्म  के   कपड़े पुराने हो  गए

मौलिक व अप्रकाशित 

Views: 889

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by SALIM RAZA REWA on January 4, 2018 at 5:45pm
आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी,
आपकी इनायत और नवाज़िश के लिए शुक़गुज़ार हूँ.
Comment by SALIM RAZA REWA on January 4, 2018 at 5:44pm
भाई सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' जी,
आपकी नज़रे इनायत के लिए शुक्रिया.
Comment by SALIM RAZA REWA on January 4, 2018 at 5:44pm
त्रिपाठी जी अपका बहुत शुक्रिया
Comment by SALIM RAZA REWA on January 4, 2018 at 5:43pm
नवीन त्रिपाठी जी, ग़ज़ल में शिरकत के लिए शुक्रिया बेगाने में 1 मात्रा गिरा लें. .
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 4, 2018 at 3:29pm

आ. भाई सलीम जी, सुंदर गजल हुई है । हार्दिक बधाई।

Comment by नाथ सोनांचली on January 4, 2018 at 2:20pm

बहुत बेहतरीन ग़ज़ल सलिम साहब,बकमाल। क्या खूब कहा आपने।

अब भी है रग रग में क़ायम प्यार की ख़ुश्बू रज़ा 
क्या हुआ जो  ज़िस्म  के   कपड़े पुराने हो  गए

बहुत बहुत बधाई आपको।

Comment by Naveen Mani Tripathi on January 4, 2018 at 10:37am

जनाब रेवा साहब बहुत सुंदर लिखा है आपने । मेरा संशय बेगाने शब्द को लेकर है बहुधा शब्द के पहले हर्फ़ पर मात्रा नहीं गिराते हैं । बाकी कबीर साहब जानें । ग़ज़ल के लिए बधाई ।

Comment by SALIM RAZA REWA on January 4, 2018 at 10:11am
जनाब शहज़ाद उस्मानी साहब,
आपकी महब्बत के लिए ममनून हूँ.
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on January 4, 2018 at 9:59am

बहुत बढ़िया पेशकश। हार्दिक बधाई आदरणीय सलीम रज़ा 'रीवा' जी।

Comment by SALIM RAZA REWA on January 3, 2018 at 6:17pm
जनाब अफ़रोज साहब.
ग़ज़ल पर आपकी नज़रे इनायत और मशविरे के लिए शुक्रिया..

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . रिश्ते
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय "
14 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

तब मनुज देवता हो गया जान लो,- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२/२१२/२१२/२१२**अर्थ जो प्रेम का पढ़ सके आदमीएक उन्नत समय गढ़ सके आदमी।१।*आदमीयत जहाँ खूब महफूज होएक…See More
21 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . रिश्ते
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। सुंदर दोहै हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
21 hours ago
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . . रिश्ते

दोहा पंचक. . . . रिश्तेमिलते हैं  ऐसे गले , जैसे हों मजबूर ।निभा रहे संबंध सब , जैसे हो दस्तूर…See More
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन व आभार।"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आ. भाई रवि जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और सुंदर सुझाव के लिए हार्दिक आभार।"
Saturday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"बेशक। सच कहा आपने।"
Saturday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"मेरा प्रयास आपको अच्छा और प्रेरक लगा। हार्दिक धन्यवाद हौसला अफ़ज़ाई हेतु आदरणीय मनन कुमार सिंह जी।"
Saturday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"आदाब।‌ नववर्ष की पहली गोष्ठी में मेरी रचना पर आपकी और जनाब मनन कुमार सिंह जी की टिप्पणियों और…"
Saturday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"प्रेरक रचना।मार्ग दिखाती हुई भी। आज के समय की सच्चाई उजागर करती हुई। बधाइयाँ लीजिये, आदरणीय उस्मानी…"
Saturday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"दिली आभार आदरणीया प्रतिभा जी। "
Saturday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"हार्दिक आभार आदरणीय उस्मानी जी। "
Saturday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service