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वफ़ा के साथ यकीनन है वास्ता मेरा

1212 1122 1212 22
अलग है बात रखा नाम बेवफा मेरा ।।
वफ़ा के साथ यकीनन है वास्ता मेरा ।।

मेरे गुनाह का चर्चा है शह्र में काफी ।
तमाम लोग सुनाते हैं वाक्या मेरा ।।

नज़र नज़र से मिली और होश खो बैठा ।
उसे भी याद है उल्फत का हादसा मेरा ।।

वो आसुओं से भिगोते ही जा रहे दामन ।
पढा जो खत है अभी ,था वही लिखा मेरा ।

फ़िजा के पास रकीबों का हो गया पहरा ।
बढ़ा रही हैं हवाएं भी फ़ासला मेरा ।।

गरीब हूँ मैं शिकायत भी क्या करूँ उनकी ।
लड़ेगा कौन रियासत से मुकद्दमा मेरा ।।

अदालतों से मुहब्बत की बात मत कीजै ।
मेरे ज़मीर से होगा ये फैसला मेरा ।।

ये दिल सभाल के रखना, मेरी अमानत है ।
करेंगे याद कभी आप फलसफा मेरा ।।

ज़माना ढूढ रहा है तेरी निशानी को ।
कफ़न उठा के न चेहरा कहीं दिखा मेरा ।।

--नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित

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Comment by SALIM RAZA REWA on October 6, 2017 at 9:36pm

नवीन मणि त्रिपाठी जी
ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए मुबारक़बाद।

Comment by Samar kabeer on October 6, 2017 at 2:37pm
जब मिसरा पढ़ने में रुकावट यानी गुनगुनाने में न आये ।
Comment by Naveen Mani Tripathi on October 6, 2017 at 12:39pm
आ0 कबीर सर नमन फ़ज़ा पे आज कर ले रहा हूँ । बह्र दोष तो मुझे नही लगा पर यह लय दोष क्या है कृपया संक्षिप्त में बताने का कष्ट करें ।
Comment by Samar kabeer on October 5, 2017 at 12:12pm
जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें ।

'फ़िज़ा के पास रक़ीबों का हो गया पहरा'इस शैर में तक़ाबुल-ए-रदीफ़ का दोष है,और 'फ़िज़ा के पास'नहीं "फ़ज़ा पे आज" ।
'लड़ेगा कौन रियासत से मुक़द्दमा मेरा'
ये मिसरा लय में नहीं है ।

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