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आएं न आएं वो लेकिन - सलीम रज़ा रीवा

22 22 22 22 22 22 22 2

.........................................

आएं न आएं वो  लेकिन हम आस लगाए .बैठे हैं 

दिन ढलते ही शमए मुहब्बत घर में जलाए बैठे हैं 

..

आख़िर दिल की बात ज़ुबाँ तकआये तो कैसेआये 

अपनी  ख़ामोशी  में  वो  सब  राज़  छुपाये बैठे हैं 

..

हैरत है जो प्यार मुहब्बत से ना वाकिफ़ हैं यारो 

वह  इल्ज़ाम दग़ाबाज़ी का मुझ पे लगाए  बैठे हैं

..

कौन है अपना कौन पराया कैसे पहचाने कोई 

चहरों पर  तो फ़र्ज़ी चहरे लोग सजाए  बैठे  हैं

..

परदेसी और बेगानों की बात करें आख़िर कैसे 

हम तो अपनों  से  ही कितने धोके खाए बैठे हैं 

..

मुझको ये उम्मीद नहीं थी जाएंगे इक रोज़ बदल 

जिनके प्यार में हम अपना घरबार लुटाए बैठे हैं 

.......................................

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by SALIM RAZA REWA on September 28, 2017 at 8:43am
आदरणीय गिरिराज जी,
आपकी नज़रे इनायत के लिए बहुत बहुत शुक्रिया, आपकी मुहब्बत सलामत रहे,
Comment by SALIM RAZA REWA on September 28, 2017 at 8:42am
आदरणीय रवि शुक्ला जी,
आपकी मुहब्बत के लिए शुक्रिया,
Comment by SALIM RAZA REWA on September 27, 2017 at 10:25pm
जनाब अफरोज साहिब,
आपकी नज़रे इनायत के लिए शुक्रिया,
Comment by Ravi Shukla on September 27, 2017 at 12:55pm
आदरणीय सलीम जी बहुत ही अच्छी ग़ज़ल कही शेर दर शेर मुबारकबाद कुबूल करें
Comment by SALIM RAZA REWA on September 27, 2017 at 12:22pm
आदरणीय बृजेश कुमार 'ब्रज' जी,
आपकी नज़रे इनायत के लिए शुक्रिया,
Comment by Afroz 'sahr' on September 27, 2017 at 11:24am
आदरणीय सलीम साहिब ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए बहुत बहुत मुबारकबाद पेश करता हूँ।
Comment by SALIM RAZA REWA on September 27, 2017 at 4:11am
आदरणीय रामबलि गुप्ता जी,
आपकी नज़रे इनायत के लिए बहुत बहुत शुक्रिया,
Comment by SALIM RAZA REWA on September 27, 2017 at 4:10am
आदरणीय गिरिराज जी,
आपकी नज़रे इनायत के लिए बहुत बहुत शुक्रिया,
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on September 26, 2017 at 10:40pm
आदरणीय सलीम जी बहुत खूबसूरत ग़ज़ल हुई..सादर
Comment by रामबली गुप्ता on September 26, 2017 at 9:23pm
बहुत खूब भाई सलीम रज़ा जी। बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल हुई है। सादर बधाई स्वीकार करें।

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