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गज़ल- आज ढ़लती धूप सी हैं

2122/2122/2122/212

आज ढ़लती धूप सी हैं दादी नानी फिर कहाँ
तिफ़्ल सुनले चाँद परियों की कहानी फिर कहाँ

घर घरोंदे गुड्डे गुडिया राजा रानी फिर कहाँ
कश्तियाँ कागज की ये बारिश का पानी फिर कहाँ

छोड़ ये टीवी मोबाइल दौड़कर तितली पकड़
बचपना जी भरके जी ऐसी रवानी फिर कहाँ

पेड़ों की शाखें हैं सूनी खेल के मैदान चुप
जूझना हालात से सीखे जवानी फिर कहाँ

माँ के आंचल से पिता के कांधे तक फैली थी जो
बचपने की वो हुकूमत हुक्मरानी फिर कहाँ

बात हो उपदेश देने की किसी को मुफ्त में
चूकता है ऐसा मौका कोई ज्ञानी फिर कहाँ

बाग़बाँ दुश्मन बना है तेरा एे नन्ही कली
बाग में तुझको मयस्सर बाग़बानी फिर कहाँ

हर तरफ बेहूदा फ़िकरे तंज पीछे दौड़ते
अपने पर फैलाएगी बिटिया सयानी फिर कहाँ

घर नया गाड़़ी नई तहज़ीब भी जिसकी नई
वो रखे माँ बाप सी चीजें पुरानी फिर कहाँ

कोख का मोती वतन पर जो ख़ुशी से वारती
कौन है उस माँ सा दानी उसका सानी फिर कहाँ
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गजेन्द्र श्रोत्रिय
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 966

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Comment by Gajendra shrotriya on September 9, 2017 at 1:51pm
बहुत शुक्रिया जनाब सलीम रजा साहब।
Comment by SALIM RAZA REWA on September 6, 2017 at 8:59pm
भाई गजेंद्र जी अच्छी ग़ज़ल के लिए मुबारक़बाद.
Comment by Gajendra shrotriya on September 6, 2017 at 12:46pm
बहुत आभार आ० बृजेश जी। धन्यवाद।
Comment by Gajendra shrotriya on September 6, 2017 at 12:44pm
आपका बहुत बहुत आभार आ० महेन्द्र जी।
Comment by Gajendra shrotriya on September 6, 2017 at 12:43pm
आपकी सराहना के लिए ह्रदय से आभारी हूँ आ० गुरप्रीत सिंह जी। धन्यवाद।
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on September 5, 2017 at 10:58pm
इस बेहतरीन ग़ज़ल के लिए आपको हार्दिक बधाई आदरणीय..सादर
Comment by Mahendra Kumar on September 5, 2017 at 3:51pm

बहुत बढ़िया ग़ज़ल है आ. गजेन्द्र जी. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. सादर.

Comment by Gurpreet Singh jammu on September 5, 2017 at 10:50am

एक से एक खूबसूरत अशआर से सजी इस गज़क के लिए आपको दिल से बधाई आदरणीय गजेंद्र जी 

Comment by Gajendra shrotriya on September 3, 2017 at 9:57pm
आदरणीय अजय कुमार जी। आभारी हुँ आपका।
Comment by Gajendra shrotriya on September 3, 2017 at 9:54pm
बहुत शुक्रिया जनाब मो० आरिफ साहिब।

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