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गैर मुरद्दफ़ ग़ज़ल..बहरे रजज़ मुरब्बा सालिम
मुस्तफ्इलुन मुस्तफ्इलुन
2212 2212
मगरूर है वो हमसफ़र
हैरान हूँ ये जानकर

अपनी जड़ों से टूटकर
क्यूँ आदमी है दर-ब-दर

जाना कहाँ थे आ गये
ये पूँछती है रहगुजर

सब आहटें खामोश हैं
चुपचाप सी है हर डगर

आसान है अब तोड़ना
बिखरे हुये हैं सब बशर

बेआबरू ऐ इश्क़ के
हम भी बड़े थे मोतबर
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 17, 2017 at 11:44pm
बहुत बहुत आभार आदरणीय रामबली जी..जी हाँ एब ए तनाफुर तो है..लेकिन मुझे लगता है शे'र ठीक ही है..
Comment by रामबली गुप्ता on June 15, 2017 at 8:36pm
छोटी वह्र पर अच्छे अशआर कहे हैं आपने भाई ब्रजेश कुमार जी। हार्दिक बधाई स्वीकार करें।

'बिखरे हुये हैं सब बशर'

इस मिसरे में ऐब-ए-तानफुर हो गया है। देख लीजियेगा।सादर
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 14, 2017 at 11:11pm
बहुत बहुत आभार आदरणीय गुरप्रीत जी..मुझे लगता है 'थे' शब्द ने दौनों वाक्यों के मध्य सेतु का कार्य किया है..जिससे मिसरा पूर्णता को प्राप्त हुआ..वैसे कोशिश करता हूँ कुछ बदलाव कर सकूँ..सादर
Comment by Gurpreet Singh jammu on June 13, 2017 at 9:56am

आदरणीय ब्रजेश जी छोटी बह्र में बहुत ही अच्छी और पूर्ण ग़ज़ल कह दी है आपने,, बहुत बहुत बधाई आपको
जाना कहाँ थे आ गये
इस मिसरे में शायद कुछ अधूरापन ला रहा है

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 12, 2017 at 7:58pm
रचना पटल पे आपका हार्दिक स्वागत है शर्मा जी..सादर
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 12, 2017 at 7:57pm
बहुत बहुत आभार आदरणीय आरिफ जी..सादर
Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 12, 2017 at 5:44pm

लाजबाब गजल हुई है आदरणीय बृजेश कुमार जी , बहुत बहुत बधाई आपको 

Comment by Mohammed Arif on June 11, 2017 at 9:46pm
आदरणीय बृजेश कुमार जी आदाब, बहुत बेहतरीन ग़ज़ल । शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल कीजिए । बाक़ी गुणीजन अपनी राय देंगे ।

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