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निकलना एक दिन है इस मकाँ से

बह्र 1222 1222 122

करो उम्मीद मत यूँ आसमाँ से ||
बिना मिहनत न कुछ मिलता वहाँ से||

उठाते साथ थे छप्पर सभी जब
हटा विश्वास क्यूँ फिर दरमियाँ से ||

कफ़न सर से कहाँ वो बाँधते हैं
मुहब्बत है जिन्हें अपनी ही जाँ से ||

जहन्नम से नही कम होती दुनिया
कोई भी गर नही जाता जहाँ से ||

कमी क्या रह गई इस ज़िन्दगी में?
दुआएँ मिल गई गर बाप माँ से ||

निकल कर अश्क वो कहते हैं अक्सर
जिसे कोई न कह पाये जुबाँ से ||

करो मत प्यार इतना 'नाथ' तन को
निकलना एक दिन है इस मकाँ से ||

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Gurpreet Singh jammu on March 31, 2017 at 9:09am

आदरणीय नीलेश जी,, आपने  ग़ज़ल के इस बहुत ज़रूरी पहलू पर धयान दिलाया  है,,मात्र बह्र के मुताबिक अल्फ़ाज़ फिट कर  देना ही काफी नहीं ,, गेयता का भी धयान रखना ज़रूरी है ,,यह कमी मुझे मेरी ग़ज़लों में नज़र आती है ,,इसे सुधारने की कोशिश करूँगा।  .. .. ..... ... धन्यवाद आपका 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on March 31, 2017 at 8:45am

बहुत ख़ूब आ. सुरेन्द्र नाथ जी ..
शब्दों की तरकीब को थोडा सा बदलने से गैयता बढ़ेगी ...जैसे ..
.
जहन्नम से न होती कम ये दुनिया
अगर जाता नही कोई यहाँ से ||.....
.
इसी प्रकार थोडा सा और चिन्तन कर के ग़ज़ल की ग़ज़लियत को निखारा जा सकता है.
सादर 

Comment by नाथ सोनांचली on March 30, 2017 at 2:27pm
आद0 वासुदेव अग्रवाल जी सादर अभिवादन, आपके गजल पर उपस्थिति और हौसला अफजाई के लिए दिल से आभार
Comment by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on March 30, 2017 at 11:31am
आ0 सुरेन्द्र नाथ जी बहुत सुंदर ग़ज़ल हुई है। शेर दर शेर बधाई।
Comment by नाथ सोनांचली on March 29, 2017 at 10:45pm
आदरणीय गुरप्रीत भाई साहब सादर अभिवादन, गजल पसंद आयी, लिखना सार्थक हुआ, आभार आपका।
Comment by नाथ सोनांचली on March 29, 2017 at 10:44pm
आद0 मोहित मुक्त जी सादर अभिवादन, ग़ज़ल पर आपकी हौसला अफजाई और सुखनवाजी के लिए दिल से आभार
Comment by Gurpreet Singh jammu on March 29, 2017 at 8:39pm
आदरणीय सुरेन्द्र नथ जी..क्या तारीफ़ करूँ इस गज़ल की...वाह वाह क्या ही खूबसूरत गज़ल हुई है..आनंद आ गया गज़ल पढ़कर ..बहुत अच्छे अशआर कहे हैं आपने.

करो उम्मीद मत यूँ आसमाँ से ||
बिना मिहनत न कुछ मिलता वहाँ से||

कफ़न सर से कहाँ वो बाँधते हैं
मुहब्बत है जिन्हें अपनी ही जाँ से |

निकल कर अश्क वो कहते हैं अक्सर
जिसे कोई न कह पाये जुबाँ से ||

करो मत प्यार इतना 'नाथ' तन को
निकलना एक दिन है इस मकाँ से |

यह अशआर तो बहुत ही पसंद आए..बहुत बधाई आपको इस शानदार गज़ल के लिए
Comment by नाथ सोनांचली on March 29, 2017 at 7:25pm
मोहतरम मोहम्मद आरिफ जी सादर अभिवादन, आपकी ग़ज़ल पर उपस्थिति और हौसला अफजाई के लिए सादर आभार
Comment by नाथ सोनांचली on March 29, 2017 at 7:23pm
आद0 समर कबीर साहब सादर प्रणाम, आपकी गजल पर उपस्थिति और हौसला अफजाई के लिए हृदय की गहराईयो से आभार
Comment by Mohammed Arif on March 29, 2017 at 6:48pm
आदरणीय सुरेंद्रनाथ जी आदाब, बेहतरीन ग़ज़ल के लिए शेर दर शेर दाद के साथ मुबारकबाद । ग़ज़ल के मक़ते में तन की नश्वरता की ओर अच्छा इशारा है ।

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